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Showing posts from 2025

हम दोनों एक-दूसरे से पूर्ण (300)

हम दोनों भले ही अलग आयामों में जन्मे हों, पर किसी ब्रह्माण्डी कोड में बहुत पहले ही— किसी बाइनरी स्क्रिप्ट के 0 और 1 में हम लिख दिए गए थे। तुमसे मिले बिना मैं चल तो रहा था— पर ठीक वैसे जैसे कोई डिवाइस अनंत काल से सेफ़ मोड में हो। अधूरा, संकुचित, फीके रंगों-सा, बस अपनी ही स्क्रीन में उलझा हुआ। और जब तुम आई— तो लगा जैसे ज़िंदगी पहली बार फुल-बूट हुई हो। सारे ड्राइवर्स, सारे अपग्रेड, अपने आप इंस्टॉल हो गए। मानो जीवन ने पहली बार हाई-रेज़ोल्यूशन में खुद को देखा हो। कभी कभी लगता है कि, हम दोनों एक दूसरे के बिना क्या हैं, शायद कुछ भी नहीं, बिल्कुल निरर्थक। अगर मैं मदरबोर्ड हूँ— तो तुम मेरी नसों में दौड़ती लेटेस्ट प्रोसेसर की क्लॉक-स्पीड, जो मेरे हर सेकंड को अपने प्रेम की ताल देती है। अगर मैं SMPS हूँ— तो तुम वह पावर-सप्लाई, जो मेरी हर वायर, हर सॉकेट में नई उम्मीद और रौशनी भर देती हो। अगर मैं CPU हूँ— तो तुम मेरा हीट-सिंक, जिसके बिना ज़रा सा लोड बढ़े तो मैं मोम की तरह पिघल जाऊँ। अगर मैं हार्ड डिस्क हूँ— तो तुम प्रेम का वह अमर डेटा, जो सदियों बाद भी, बिना करप्ट हुए, वैसा का वैसा पढ़ा जा सकेगा। अग...

सुबह सुबह जो छू लेते हो...

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सुबह-सुबह जो छू लेते हो, तुम इस तन की डाली को, प्रेम भरा आलिंगन करता, ज्यों भंवरा फुलवारी को। नयन ये बरबस झुक जाते हैं, लब-लब पर आ रुक जाते हैं, लहरा उठता है मन का सागर, पा गालों पर लाली को। स्वर्ग हुई है जीवन बगिया, पावन मन का कोना-कोना, तेरा होना मुझको भाया, तुम ही अब जीवन का गहना, आस यही कि भूल के खुद को, मन में तेरे छुप जाऊं, प्रीतम मेरे थाम लो आकर, मन की तुम लाचारी को, सुबह सुबह जो छू लेते हो, तुम इस तन की डाली को, प्रेम भरा आलिंगन करता, ज्यों भंवरा फुलवारी को, टूट गई सब लाज की गाठें, सदियों से थीं प्यासी रातें, मिलन के इस आवेश में भूली, करनी तुमसे कितनी बातें, राज सभी खुलते जीवन के, राग नए बजते हैं मन के, तुम ही कह दो थाम लूं कैसे, इस यौवन मतवाली को। सुबह सुबह जो छू लेते हो, तुम इस तन की डाली को, प्रेम भरा आलिंगन करता, ज्यों भंवरा फुलवारी को। प्रथम मिलन मधुमास की रातें, इतनी जीवन की सौगातें, तुम को पाया अब पाना क्या, सब पूरी मन की फरियादें, सब मधुमय है जीवन लय है, अमर हमारा ये परिणय है, तुमसे मेरा तन मन रोशन, भूल ही बैठी दीवाली को। सुबह सुबह जो छू लेते हो, तुम इस तन क...

रूह का पासवर्ड 299

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ये विरह नहीं, ये एक स्क्रीन फ़्रीज़ है, जहाँ मैं हूँ जहाँ तुम, पर टच में ग्लिच है। रिश्ते की ये चैट हिस्ट्री अब भी खुली पड़ी, किसी इमोजी पर मेरा न, नाम स्टिच है। तेरे चेहरे की वो साफ़ HD क्वालिटी, मेरी पलकें आज भी ऑटो-लोड कर लेती। पर जब आवाज़ सुनने की आती है बारी, तो हर बार वही नो-सिग्नल वार्निंग देती। तुम जैसे हो कोई इनबिल्ट एप्लीकेशन, जिसे डिलीट करने का ऑप्शन नहीं होता। मेरा दिल तुम्हारे पुराने वर्ज़न पर अटका हुआ है, तभी नए ज़माने का मैं कोई फोन नहीं लेता। ये दूरी नहीं—ये है वक़्त का फ़ायरवॉल, ये वायरस नहीं, खिड़की का है न्यू इंटरफेस। और इंतज़ार है उस यूनिक पासवर्ड का, जो तुम्हारी रूह के कीबोर्ड पर है कहीं ट्रेस। लेकिन, मेरी हार्ड डिस्क के हर एमबी में, एमबी ही नहीं—सुनो, हर एक बिट में। बस तुम्हारी आँखों का बाइनरी कोड लिखा है, तुम्हारी मुस्कुराहट बहती है मेरे हर सर्किट में। ये सपने नहीं—प्यार की बैकअप फ़ाइलें हैं, जहाँ हर रात डाउनलोड होता है तेरा ही नाम। सुबह आँख खुलते ही रोज एक एरर आता, क्योंकि दिल में अब भी है तेरा आउटडेटेड प्रोग्राम। मेरी रातें तेरी वॉइस-नोट की तरह हैं— बस एक लूप म...

तो कोई बात हो 298

मेरी पूछ का जो जवाब हो, तो कोई बात हो उस बात में। कोई राज, सच में जो राज हो, तो कोई बात हो उस राज में। मेरे रतजगों के हिसाब की, कोई हो कहानी तो कह भी दो। कोई मन जो चूं के निढाल हो तो कोई बात हो उस बात में। तुम तो कह रही हो, जग कही, कभी मन कही पर, ध्यान दो, ये जमाना कुछ तो कहेगा ही, इसे जिंदगी पर न लाद दो। कोई बात ऐसी सुनो कभी, तुम न साथ दो उस बात में। जो जला दे बुझती राख को,  वहीं फूंक हो अंगार में। मैं तो थाम लूँ तेरी हर थकन,  तुझे फिर हँसी में ढाल दूँ, तू जो चाह ले, मैं वक़्त से,  तेरे नाम की फिर मिसाल दूँ। कभी हार कर भी न हारना,  बस ये याद हो हर हार में। तुम जो टूट कर भी लड़ सको,  तो कोई बात हो उस रार में, तुम जो हारे दिल को थाम लो,  तो बहार होगी आज ही, तुम यकीन करके कहो सुबह,  तो उगेगा सूरज रात ही। जो उम्मीद की एक लकीर हो,  वो ही साथ हो बस साथ में। थके पाँव फिर भी सफ़र रहे,  तो कोई बात हो उस चाल में तेरी एक हँसी में अटक गई, तेरी जुल्फों में है भटक गई तेरी आँखों में कभी डूबी तो,  सारे जग को आँखें खटक गईं। ये नजर मिले तो ये जग जले, जरा...

ये हकीकत ही है, रात भर ख्वाब में 297

ये हकीकत ही है, रात भर ख्वाब में, तुमको आना ही है, तुमको जाना ही है, प्यास में प्रीत बन, मात में मीत बन, तुमको मुझपे घटा बनकर छाना ही है। तुम सुनो तो बहुत तेज हैं धड़कनें, प्रीत में बस जमाने की हैं अड़चनें, मन के विश्वास पर तुम यकीन तो करो दूर होंगी मोहब्बत की सब उलझनें।  दहशतें कुछ भी हों, इश्क़ में पर सुनो प्रेम का गीत हमको तो गाना ही हैं। प्यास में प्रीत बन, मात में मीत बन, तुमको मुझपे घटा बनकर छाना ही है। झूठ सच से भरी एक कहानी नहीं, मीरा यूं ही बनी थी दीवानी नहीं, प्रेम से ही सुनो सारी सृष्टि ये है, प्रेम के बिन तो कोई कहानी नहीं चाहे कुछ भी कहो, पर जहान के लिए इश्क सच हो मगर, एक फसाना ही है। प्यास में प्रीत बन, मात में मीत बन, तुमको मुझपे घटा बनकर छाना ही है। जुल्फें बिखरी हैं, इनको सँवारो जरा, मुझको मझधार से तुम उबारो जरा, मन के आंगन में बिखरा अंधेरा घना, चाँद बन कर के अब तुम पधारो जरा मैं तो भटका हूँ सदियों, तेरी चाह में, तेरा दिल मेरा अंतिम ठिकाना ही है। प्यास में प्रीत बन, मात में मीत बन, तुमको मुझपे घटा बनकर छाना ही है। दूर बरसों रहे, पास आओ प्रिये, न मोहब्बत में इतना, स...

मिली-मिली-सी मिली नहीं हो 296

मिली-मिली-सी मिली नहीं हो, जुदा-जुदा-सी जुदा नहीं तुम, हो छा रही तुम गगन धरा पर ख़ुदा-ख़ुदा-सी, ख़ुदा नहीं तुम। ये बात समझा नहीं जमाना, तुम्हारा मिलना कमाल-सा है, खुदा ने जैसे मरु धरा पर, रचा नया एक जमाल-सा है खिला दिया है ये बाग दिल का, घटा-घटा-सी, घटा नहीं तुम हो छा रही तुम गगन धरा पर, ख़ुदा-ख़ुदा-सी, ख़ुदा नहीं तुम। किसी सफर में किसी डगर में, कोई भी रस्ता, जुदा कहाँ है, तुम्हीं से चलकर, तुम्हीं पर आना, मेरा तुम्हीं पर थमा जहान है। तुम्हीं में मिलना है लक्ष्य अंतिम, धरा-धरा-सी धरा नहीं तुम। हो छा रही तुम गगन धरा पर, ख़ुदा-ख़ुदा-सी, ख़ुदा नहीं तुम। है चाह ऐसी लगी तुम्हारी,  दीवाना ये दिल बहक रहा है अथाह तुमसे ले प्रेम मन में, ये मन का पंक्षी चहक रहा है मुझे पतंगा बना दिया पर,  शमा-शमा-सी, शमा नहीं तुम। हो छा रही तुम गगन धरा पर, ख़ुदा-ख़ुदा-सी, ख़ुदा नहीं तुम। ये मेघ उड़ते महल हैं जैसे, तेरी कहानी छुपा रहे हैं, नयन तुम्हारे ये बनके बिजली,  दीवानों को बस मिटा रहे हैं उड़ा दी सारी है नींद जग की बला-बला-सी, बला नहीं तुम। हो छा रही तुम गगन धरा पर, ख़ुदा-ख़ुदा-सी, ख़ुदा नहीं त...

ये चाँद लंबी आहें भर रहा है क्यों (295)

ये चाँद लंबी आहें भर रहा है क्यों? देख कर तुम्हें ये जल रहा है क्यों? मिल रहे हज़ारों लोग जिंदगी की राह में, ये दिल मेरा तुम्हीं पर अड़ रहा है क्यों?.... देखिए अजीब है, अजीब है, अजीब है, अजनबी से तुम तुम्हीं से बंध गया नसीब है, खिल रहे हैं नव कंवल, मन के सूखे ताल में, छप रहे हैं शब्द नवल मन की इस किताब में, हो रही हैं बारिशें, ये मन भटक रहा है क्यों? ये दिल मेरा तुम्हीं पर अड़ रहा है क्यों?.... बन रही है बात फिर बातों से कहानियाँ, ठन रही है रार और लड़ रही जवानियाँ। प्रेम में लिया जो थाम हाथ कैसे छोड़ दें, बात जो कही कभी वो बात कैसे मोड़ दें। प्रेम ही खुदा कहो तो, जग उलझ रहा है क्यों? ये दिल मेरा तुम्हीं पर अड़ रहा है क्यों?.... चाँदनी है रात बात चाँद की ही चल रही, उमंग दिल में ज्वार-सी, चढ़ रही उतर रही, बह रही हैं रश्मियाँ सिंधु इस विशाल में  बहक रहा है मन मेरा, तुमको पाकर साथ में, साथ देख तुमको मेरे जग ये जल रहा है क्यों? ये दिल मेरा तुम्हीं पर अड़ रहा है क्यों?....

यकीं है मुझको 294

सुरमई शाम, गजब ढ़ाएगी, यकीं है मुझको, बात ये याद, बहुत आएगी, यकीं है मुझको। जिसपे करता हूँ, उजड़ती है यकीं की खेती, तू भी ये रीत निभाएगी, यकीं है मुझको। सुन जरा वक्त बुरा आने दे होगा फिर वही, तू मुझे छोड़ के जाएगी यकीं है मुझको। ये जहान सच है, फरेबी है, मनमीत-सा है? रात ये बात सिखाएगी यकीं है मुझको। मेरा हर सच इस जमाने में रुस्बा होगा, झूठ हर बात कही जाएगी, यकीं है मुझको। उसको हर हाल में बेशक चले आना होगा, जब मेरी आह बुलाएगी, यकीं है मुझको। कोई हो शेख, नमाज़ी, पंडित, साधु, मौत ये रहम न खाएगी, यकीन है मुझको। वो तो कर्मों के तराजू पर ही तोलेगा मुझे, काम ये जात न आएगी, यकीं है मुझको। ~Vishu 

मैं अधूरा हो गया हूँ (293)

तुम हो छोले, मैं भटूरा हो गया हूँ, तुमसे मिलकर मैं चटोरा हो गया हूँ, बिन तुम्हारे हो गया आधा अधूरा तुम हो चटनी मैं पकौड़ा हो गया हूँ। कल सुनो, मैं भी चलूँगा साथ तेरे, हाथ में देना सजनिया, हाथ मेरे, दूर जाना है, जहाँ कोई नहीं हो, कल की छुट्टी, मैं रहूँगा साथ तेरे। हाँ वही, खट्टे-से पानी की वो पूड़ी, जिसके बिन शामें तुम्हारी, हैं अधूरी। और तीखा और खट्टे की दुहाई, मुझको भी भाने लगी है वो खटाई, हाँ तुम्हीं-सा मैं तो थोड़ा हो गया हूँ, तुमसे मिलकर मैं चटोरा हो गया हूँ। मोमो की खुशबू में डूबी तुम खड़ी थीं, और होठों पर लगी चटनी तुम्हारी, खो गया था दिल, तुम्हें तो याद है न, जब मिली थीं तुम, मुझे वो शाम प्यारी, आज तक भुला नहीं है साथ तेरा, जब लिया हाथों में तुमने हाथ मेरा। याद है मुझको वो तेरी आँख का रंग, तेज मिर्च से था बदला गाल का रंग, मोमो की चटनी में थोड़ा खो गया हूँ, तुमसे मिलकर मैं चटोरा हो गया हूँ। बाग में हैं आज कल चर्चे तुम्हारे, जल रही हैं देख कर तुमको बहारें, इन निगाहों में छुपा कर बिजलियाँ तुम, कर रही हो पास आने के इशारे, नागिनों से पाश में ले खींचती हो, नयनों को तुम रात करके मींचती ह...

गीत कोई तुम गाओ...

गीत कोई तुम गाओ, और इस दिल को बहलाओ,  सब भूलूँ जगत की रीते, तुम भी जग को बिसराओ।  मैं दीप करूँ तन-मन को, तुम दीप शिखा बन कर के,  पतझड़-सा है ये जीवन, तुम फूलों-सा महकाओ। है चंद्रिका सी शीतल, ये रातें खूब जलाएँ,  तुमसे दूर ओ साजनी, रजनीगन्धा ना भाये,  बुझता उम्मीद का दीपक, इतनी लंबी है दूरी, तुम बनकर घटा सुहानी, बस प्रेम सुधा बरसाओ,  मैं दीप करूँ तन-मन को, तुम दीप शिखा बन जाओ। जो जन्मों की है दूरी, तो जीकर क्या है करना, तुम बिन ओ मेरे साजन, मुश्किल बहुत है मरना,  है जीवन ये एकांकी, ढलते सूरज की छाया,  तुम आ जाओ जीवन में, एक नया सवेरा लाओ।  मैं दीप करूँ तन-मन को, तुम दीप शिखा बन जाओ। दिल कब से ढूँढ रहा है, कोई मार्ग तुझे पाने का,  कहीं ऐसा न हो जाए, हो वक्त मेरे जाने का,  मैं दुनिया छोड़ ना जाऊँ, तुझसे मिलने से पहले,  तुम जल्दी से आकर बस, मुझको अपना कर जाओ।  मैं दीप करूँ, तन-मन को, तुम दीप शिखा बन जाओ।