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चल फिर, जीवन धार में उतरें

उम्मीदी पतवार को लेकर, चल फिर, जीवन धार में उतरें। क्या होगा, उसका भय छोड़ें, चल फिर, इस मझधार में उतरें। जो चाहा वो, मिलना मुश्किल, नामुमकिन, कुछ काम नही है, जग ना समझे, लेकिन फिर भी, स्वप्न अनमोल, कुछ दाम नही है अपनी ताकत, कमजोरी सब ले, टकराने, संसार से उतरें। क्या होगा, उसका भय छोड़ें, चल फिर, इस मझधार में उतरें। है टूटा, जो जाम उठाया, है छूटा, जग में जो भाया, लाख अंधेरे जब छाए थे, आशाओं ने राह दिखाया। छाई अंधेरी, उम्मीदों के, दीप लिए फिर हाथ में उतरें। क्या होगा उसका भय छोड़ें, चल फिर, इस मझधार में उतरें।

वक़्त

कुछ पल में सारे रिश्ते, बस टूट गए हैं छन्न से। जब से लोगो ने जाना, अब वक़्त बुरा है हमारा। चाहत की सारी महफ़िल, ख्वाबो में आ सिमटी है, हां टूट गया हूँ लेकिन, मैं मन से नही हूँ हारा। प...

इश्क़ की गुफ्तगू

तुमसे होने लगी, इश्क़ की गुफ्तगू, जिन्दगानी हमारी, सवँर जायेगी, ऐसे आये हो मेरी, कहानी में तुम, हर कहानी हमारी, सवँर जायेगी। तुम कहो तो मुझे, कुछ कही अनकही, दिल का कोई तराना, जो कह ना सके, मुझको आंखो मे ऐसे, बसा लो पिये, कोई आंसू कभी, इनसे बह ना सके, इश्क भी तो खुदा का ही वरदान है, अब खुशी कोई बचकर, किधर जायेगी ऐसे आये हो मेरी, कहानी में तुम, हर कहानी हमारी, सवँर जायेगी। वो जो छुटा, जो टूटा, तेरा कुछ न था, गम की यादें, मिटाने की, कोशिश तो कर, हर तरफ बस है बिखरी खुशी फूल सी, इनको बढकर उठाने की कोशिश तो कर, थोडा कर हौसला, खुद से नजरें मिला, तू जो हंस दें, बहारें बहक जायेंगी, ऐसे आये हो मेरी, कहानी में तुम, हर कहानी हमारी, सवँर जायेगी।

हसीन दुनियां

हो मुस्कुराहट सबके चेहरे पर, क्या ऐसी एक दुनियाँ बन नही सकती? हसीन सपने हो हर एक की आंखों में, क्या ऐसी एक दुनियाँ बन नही सकती? कहने को तो हम हर एक चीज़ बना लेते है, चाँद पर भी अपने ...

ये जो इल्म है, वो कहीं नही

ये जो इल्म है, वो कहीं नही, जो है जिंदगी की किताब में, हर एक पल, है सबक नया, जाने क्या है, कल के हिजाब में। जो नही चला दी उसे भी सीख, जो चला तो मंजिल हज़ार दी, हैं हज़ारों रंग, सब मिले-जुले, ...

विकास और प्रकृति

कितने राजाओं के वैभव, कितने रंकों की झौपड़ियां धूल हुईं, कितने विकास की फुलझिड़यां, देख शमशान का मूल हुईं। क्यों-कर खेल रहा सृष्टि से, मानव का अधिकार नहीं है, सबसे अद्भुत रचना ब्रम्हा की, लेकिन तू भगवान नहीं हैं। यदा यदा हि धर्मस्य में, श्रीकृष्ण यही बतलाते हैं, जो बाधक बनते सृष्टि कर्म में, तो खुद वो उसे मिटाते हैं। हर तरफ क्रंदन मानव का, देख मेरा मन बहुत ही रोता, कैसा विकास किया हमने, ऐसा कहर है हमपर टूटा। जरा सी पलकों के हिलने से, देख तेरा क्या हाल हुआ है। सुन ध्वनि ये, बिचलित है पर, क्रोधित नहीं महाकाल हुआ है। मानवता का भविष्य सुरक्षित, प्रकृति से कर, बैर नही हैं, कर विकास प्रकृति के संग, वरना तेरी खैर नहीं हैं। --नेपाल भूकंप की पृष्टभूमि पर लिखी गई--

ठान लो तो जीत है

जिन्दगी की बस यही तो, एक सरल सी रीत है, मान लो तो हार है और ठान लो तो जीत है।। कदमों में है, क्या समंदर, क्या शिखर, क्या आसमा, तेरी हद से कुछ नहीं, बाहर मेरे मन मीत है तू क्यों हिम्मत हार बैठा, है भले दुष्वार ये, हर तरफ मुश्किल बड़ी, है कहां इनकार ये, जिन्दगी है नाम इसका, ये तो बदले हर घड़ी, कुछ मुकद्दर से नही, बस कर्म से साकार ये। हो भले ही प्यास उच्चतम, शुष्क सब संगीत है मान लो तो हार है और ठान लो तो जीत है।। खो गई मंजिल भले ही, वक़्त के इस धार मे , है नही मिलता सभी को, ये जहां उपहार में, जिसने उठ कर तोड़ डाले, है सभी बन्धन सफर के, उसके कदमो में झुके सब, जीत छुपी हर हार में। छा गया घनघोर तम पर, हाथ में एक दीप है, मान लो तो हार है और ठान लो तो जीत है।। कैसे छूटे राह वो जो, मंजिलो पर जा रही, मंजिलो से बस हवाए, महकी-बहकी आ रही, हो भले ही दूर लेकिन, रुक मै जाऊँ भी तो कैसे, मुझको पा लो बस यही, कह मंजिले बुला रही, सारा जग हो जाये रुस्वा, या टूटी सारी प्रीत है, मान लो तो हार है और ठान लो तो जीत है।।