गीत कोई तुम गाओ...

गीत कोई तुम गाओ, और इस दिल को बहलाओ, 
सब भूलूँ जगत की रीते, तुम भी जग को बिसराओ। 
मैं दीप करूँ तन-मन को, तुम दीप शिखा बन कर के, 
पतझड़-सा है ये जीवन, तुम फूलों-सा महकाओ।

है चंद्रिका सी शीतल, ये रातें खूब जलाएँ, 
तुमसे दूर ओ साजनी, रजनीगन्धा ना भाये, 
बुझता उम्मीद का दीपक, इतनी लंबी है दूरी,
तुम बनकर घटा सुहानी, बस प्रेम सुधा बरसाओ, 
मैं दीप करूँ तन-मन को, तुम दीप शिखा बन जाओ।

जो जन्मों की है दूरी, तो जीकर क्या है करना,
तुम बिन ओ मेरे साजन, मुश्किल बहुत है मरना, 
है जीवन ये एकांकी, ढलते सूरज की छाया, 
तुम आ जाओ जीवन में, एक नया सवेरा लाओ। 
मैं दीप करूँ तन-मन को, तुम दीप शिखा बन जाओ।

दिल कब से ढूँढ रहा है, कोई मार्ग तुझे पाने का, 
कहीं ऐसा न हो जाए, हो वक्त मेरे जाने का, 
मैं दुनिया छोड़ ना जाऊँ, तुझसे मिलने से पहले, 
तुम जल्दी से आकर बस, मुझको अपना कर जाओ। 
मैं दीप करूँ, तन-मन को, तुम दीप शिखा बन जाओ।

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