मोक्ष तजना चाहता हूँ (#304)
अब सफलता के सफर में एक विफलता चाहता हूँ, प्रेम का अक्षय गरल पी मैं अमरता चाहता हूँ। चाहता हूँ जिंदगी की साँझ तक तुझको निहारूँ, मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ। हाँ यक़ीनन तुमको पा मैं मोक्ष तजना चाहता हूँ। क्या कहा मुमकिन नहीं है प्रेम में अमरत्व पाना, क्या कहा जलने न देगा प्रेम का दीपक जमाना, पर उम्मीदें भर के मन में, स्वयं को करके समर्पित, बस अनंत चिंगारियों-सा मैं धधकना चाहता हूँ, मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ। तुम व्यर्थ ही हो व्यथित कि कैसे फिर पहचान होगी, ये तुम्हारी नील आँखें प्रेम का प्रतिमान होंगी। जन्मों तक मुझको भले ही, करनी हो तेरी प्रतीक्षा, मैं तुम्हें पहचानने की एक परीक्षा चाहता हूँ, मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ। ज्ञान और अज्ञान के इस तर्क से मैं तो विफल हूँ, पर तुम्हारे प्रेम के मैं इस धरातल पर अटल हूँ। प्रेम में मुझको नहीं अब देवत्व की अभिलाषा, छोड़ कर मैं हिम तपस्या तुममें रमना चाहता हूँ। मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ। लक्ष्य मेरा सच कहूँ तो हिमशिखर या क्षीर नहीं है, है मेरा मन राधिका-सा तुम बसे ...