तो कोई बात हो 298

मेरी पूछ का जो जवाब हो,
तो कोई बात हो उस बात में।
कोई राज, सच में जो राज हो,
तो कोई बात हो उस राज में।
मेरे रतजगों के हिसाब की,
कोई हो कहानी तो कह भी दो।
कोई मन जो चूं के निढाल हो
तो कोई बात हो उस बात में।


तुम तो कह रही हो, जग कही,
कभी मन कही पर, ध्यान दो,
ये जमाना कुछ तो कहेगा ही,
इसे जिंदगी पर न लाद दो।
कोई बात ऐसी सुनो कभी,
तुम न साथ दो उस बात में।
जो जला दे बुझती राख को, 
वहीं फूंक हो अंगार में।


मैं तो थाम लूँ तेरी हर थकन, 
तुझे फिर हँसी में ढाल दूँ,
तू जो चाह ले, मैं वक़्त से, 
तेरे नाम की फिर मिसाल दूँ।
कभी हार कर भी न हारना, 
बस ये याद हो हर हार में।
तुम जो टूट कर भी लड़ सको, 
तो कोई बात हो उस रार में,


तुम जो हारे दिल को थाम लो, 
तो बहार होगी आज ही,
तुम यकीन करके कहो सुबह, 
तो उगेगा सूरज रात ही।
जो उम्मीद की एक लकीर हो, 
वो ही साथ हो बस साथ में।
थके पाँव फिर भी सफ़र रहे, 
तो कोई बात हो उस चाल में



तेरी एक हँसी में अटक गई,
तेरी जुल्फों में है भटक गई
तेरी आँखों में कभी डूबी तो, 
सारे जग को आँखें खटक गईं।
ये नजर मिले तो ये जग जले,
जरा हाथ दो मेरे हाथ में।
जहाँ तुम रहो और कुछ न हो,
तो क्या बात हो उस रात में।



मैं जो ढह रहा हूँ ख़याल में, 
तू नज़र बने मेरी राह की,
ज़रा धूप रख दे तू साँस में, 
मैं सहर बना लूँ चाह की।
जो अँधेरों में भी अमर रहे, 
तो कोई बात हो उजास में।
मेरी उलझनों का सुझाव हो, 
तो कोई बात हो उस बात में।

Comments

Popular posts from this blog

मोक्ष तजना चाहता हूँ (#304)

हर्ष विकंपित हो रही हैं..p 289

रूह का पासवर्ड 299