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खूबसूरत, हसीन, नाज़नीन, कहकशा P305

खूबसूरत, हसीन, नाज़नीन, कहकशा, अब कहो क्या कहें क्या पुकारें तुम्हें, चाँद हो, रात हो, शाम हो, तुम सुबह, आओ पलकों पर अपनी बिठा लें तुम्हें। कहकशाएँ लटों में समेटे हुए, तुम सुनो मेरा पूरा ही संसार हो, तेरा कंगन प्रिय है ब्लैक होल-सा, मुझको खींचे तुम्हीं वो गुरुभार हो, तुमसे दूरी रहे ये तो मुमकिन नहीं, तुम कहो तो गले से लगा लें तुम्हें। चाँद हो, रात हो, शाम हो, तुम सुबह, आओ पलकों पर अपनी बिठा लें तुम्हें। तुम महकती हुई कोई ताज़ा ग़ज़ल, या कविता कोई राधिका नाम की। प्रेम का गीत हो, या कोई आरती, रोशनी हो तुम्हीं, कृष्ण के धाम की। तुम मुझे प्रेम का आकर वरदान दो, प्रेम मंत्रों से हम या तो पा लें तुम्हें। चाँद हो, रात हो, शाम हो, तुम सुबह, आओ पलकों पर अपनी बिठा लें तुम्हें। शून्यता से परे तुम किसी राग की, एक मादक मनोहर सी आवाज हो, हो कोई सीप जो, मोतियों से भरी, स्वप्न हो, एक मीठा सा अहसास हो। तुम चले आओ जीवन को पूरा करो, या बताओ कि कैसे बुला लें तुम्हें। चाँद हो, रात हो, शाम हो, तुम सुबह, आओ पलकों पर अपनी बिठा लें तुम्हें। गुरुभार — ग्रैविटी, विराट द्रव्यमान या आकर्षण-केंद्र जिसकी ओर सब स्...

मोक्ष तजना चाहता हूँ (#304)

मैं सफलता के सफर में एक विफलता चाहता हूँ, प्रेम का अक्षय गरल पी मैं अमरता चाहता हूँ, चाहता हूँ जिंदगी की शाम तक तुझको निहारूँ, मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ। हाँ यक़ीनन तुमको पा मैं मोक्ष तजना चाहता हूँ। क्या कहा मुमकिन नहीं है प्रेम में अमरत्व पाना, क्या कहा जलने न देगा प्रेम का दीपक जमाना, पर अनंत चिंगारियों-सा मैं धधकना चाहता हूँ, मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ। तुम व्यर्थ ही हो व्यथित कि कैसे फिर पहचान होगी, ये तुम्हारी नील आँखें प्रेम का प्रतिमान होंगी, मैं तुम्हें पहचानने की एक परीक्षा चाहता हूँ, मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ। ज्ञान और अज्ञान के इस तर्क से मैं तो विफल हूँ, पर तुम्हारे प्रेम के मैं इस धरातल पर अटल हूँ, छोड़ कर मैं हिम तपस्या तुममें रमना चाहता हूँ, मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ। लक्ष्य मेरा सच कहूँ तो हिमशिखर या क्षीर नहीं है, है मेरा मन राधिका-सा तुम नहीं पर पीर नहीं है, तुमको पाना मैं नहीं बस तुममें तरना चाहता हूँ, मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ। हो समय का काल अंतिम जब ये सृष्टि थरथराए, ...

सदियाँ बीती जैसे तुमको 303

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सदियाँ बीती लगता है तुमको,  देखा था अफसानों में। चमक तुम्हारी पड़ते ही लो,  जान पड़ी मयखानो में। खुशबू अब भी साँसों में है,  पास से बस गुजरी तुम थी, चंदन-चंदन बदन हुआ है,  नाम है अब दीवानो में। होठों पर तैरी बिजली-सी,  थी मुस्कान कयामत की। मुझको तेरा मिलना जैसे,  ईश्वर की है नियामत-सी। तेरा हाथ लिए हाथों में,  चलना है और थमना है, जीवन में सारी खुशियों की,  तुम जैसे हो जमानत-सी। रहना है अंतिम सांसों तक,  तेरे दिल के खानों में। चंदन-चंदन बदन हुआ है,  नाम है अब दीवानो में। चाल है ऐसी, मौजें बहकें,  नदियाँ सब शरमा जाएँ। ज़ुल्फ़ें जैसे काली घटाएं, मेरे आंगन छा जाएँ।  इस आँचल में बहक गई उस,  हवा का भी अंदाज़ सुनो, सूखी-मुरझाई शाखें भी,  झूम-झूम लहराएँ, गाएँ। हुआ फ़साना हुस्न तुम्हारा,  बिखरा है अफ़सानों में। चंदन-चंदन बदन हुआ है,  नाम है अब दीवानों में। तेरी खुशबू जब भी आती,  मन भोला बहकाती है। तेरी बातों की लय सुनकर,  साँसें ठहर-सी जाती हैं। तेरे पैरों की छम-छम से,  सुंदर कोई भी साज नही...

था बहक गया जिसे देख कर (302)

था बहक गया जिसे देख कर, ये जहान शायद वही हो तुम। हो खुदा की जैसे किताब एक, बड़ी फ़ुर्सतों में बनी हो तुम। यहाँ रंग कितने गरीब हैं, इन्हें है चमक की तलाश-सी। है उजड़ गई है बिखर गई, जैसे रोशनी भी बहार की चलो, फिर से रंग दो जहान ये, कई रंग लेकर खड़ी हो तुम। हो खुदा की जैसे किताब एक, बड़ी फ़ुर्सतों में बनी हो तुम। तुम्हें मुस्कुराने की लत सी है, मैं हूँ सूखी डाली बहार में। तुझे देखना है नशा अजब, बड़ा चैन है तेरे प्यार में, मुझे अपना कहकर बुला जरा, मेरे साथ इतना लड़ी हो तुम, हो खुदा की जैसे किताब एक, बड़ी फ़ुर्सतों में बनी हो तुम। मेरी साँसों में तेरी आस है,  मेरी आसों में तेरी प्यास है। मेरे पास होके भी दूर तुम, तू ही दूर होके भी पास है, सुनो जिंदगी में खिला हुआ, कोई बाग कोई कली हो तुम! हो खुदा की जैसे किताब एक, बड़ी फ़ुर्सतों में बनी हो तुम। क्या ये इश्क का एक खिताब है, तेरे पलकों का जो हिज़ाब है? तुझे चाहना है जूनून-सा, तेरी जिंदगी को तलाश है, मैं हूँ गलतियों की किताब एक, जो सही है इसमें वही हो तुम। हो खुदा की जैसे किताब खुद, बड़ी फ़ुर्सतों में बनी हो तुम।

मात (301)

यूँ निगाह फेरी है आपने,  अब न रात होगी रात भर,  मुझे दिन निकलने से क्या भला,  जो न बात होगी बात भर। मुझे इश्क करने से रोकना, किसी नाक का ये सवाल था, तेरा साथ था मेरी जीत थी,  अब तो मात होगी मात भर। ये जहान सारा तुला रहा,  उसे बदगुमा सा ख्याल था। तुझे चाहने में सुकून था,  तुझे पा के दिल ये निहाल था, मेरे इश्क पर वो फब्तियां,  रही प्यार का हासिल सुनो, तुझे खो के कुछ भी बचा नहीं,  तुझे पा के दिल ये बबाल था। सिला अपनो पर ही यकीन का,  अब तो घात होगी घात भर, तेरा साथ था मेरी जीत थी,  अब तो मात होगी मात भर। तेरी प्यास है तेरी आस है,  पर न साथ तेरा साथ है, मुझे है पता तू न आयेगा,  तभी दिल मेरा ये उदास है सुनो इश्क की ये बंदगी,  जैसे बन गई है खुदकुशी,  मेरी रूह तुझसे जुड़ी हुई,  मेरे मन को तेरी तलाश है। सुनो तेरे दिए इस दर्द से,  बस बात होगी रात भर, तेरा साथ था मेरी जीत थी,  अब तो मात होगी मात भर। वही धूप है वही चाँदनी,  तेरा साथ था तो बहार थी, वो जो पल बिताए थे साथ में,  वही जिंदगी का सार थी। तुझे देख...

हम दोनों एक-दूसरे से पूर्ण (300)

हम दोनों भले ही अलग आयामों में जन्मे हों, पर किसी ब्रह्माण्डी कोड में बहुत पहले ही— किसी बाइनरी स्क्रिप्ट के 0 और 1 में हम लिख दिए गए थे। तुमसे मिले बिना मैं, चल तो रहा था— पर ठीक वैसे जैसे कोई डिवाइस अनंत काल से सेफ़ मोड में हो। अधूरा, संकुचित, फीके रंगों-सा, बस अपनी ही स्क्रीन में उलझा हुआ। और जब तुम आई— तो लगा जैसे ज़िंदगी पहली बार फुल-बूट हुई हो। सारे ड्राइवर्स, सारे अपग्रेड, अपने आप इंस्टॉल हो गए। मानो जीवन ने पहली बार हाई-रेज़ोल्यूशन में खुद को देखा हो। कभी कभी लगता है कि, हम दोनों एक दूसरे के बिना क्या हैं, शायद कुछ भी नहीं, बिल्कुल निरर्थक। अगर मैं मदरबोर्ड हूँ— तो तुम मेरी नसों में दौड़ती लेटेस्ट प्रोसेसर की क्लॉक-स्पीड, जो मेरे हर सेकंड को अपने प्रेम की ताल देती है। अगर मैं SMPS हूँ—तो तुम वह पावर-सप्लाई, जो मेरी हर वायर, हर सॉकेट में नई उम्मीद और रौशनी भर देती हो। अगर मैं CPU हूँ—तो तुम मेरा हीट-सिंक, जिसके बिना ज़रा सा लोड बढ़े तो मैं मोम की तरह पिघल जाऊँ। अगर मैं हार्ड डिस्क हूँ—तो तुम प्रेम का वह अमर डेटा, जो सदियों बाद भी, बिना करप्ट हुए, वैसा का वैसा पढ़ा जा सकेगा। अगर ...

सुबह सुबह जो छू लेते हो...

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सुबह-सुबह जो छू लेते हो, तुम इस तन की डाली को, प्रेम भरा आलिंगन करता, ज्यों भंवरा फुलवारी को। नयन ये बरबस झुक जाते हैं, लब-लब पर आ रुक जाते हैं, लहरा उठता है मन का सागर, पा गालों पर लाली को। स्वर्ग हुई है जीवन बगिया, पावन मन का कोना-कोना, तेरा होना मुझको भाया, तुम ही अब जीवन का गहना, आस यही कि भूल के खुद को, मन में तेरे छुप जाऊं, प्रीतम मेरे थाम लो आकर, मन की तुम लाचारी को, सुबह सुबह जो छू लेते हो, तुम इस तन की डाली को, प्रेम भरा आलिंगन करता, ज्यों भंवरा फुलवारी को, टूट गई सब लाज की गाठें, सदियों से थीं प्यासी रातें, मिलन के इस आवेश में भूली, करनी तुमसे कितनी बातें, राज सभी खुलते जीवन के, राग नए बजते हैं मन के, तुम ही कह दो थाम लूं कैसे, इस यौवन मतवाली को। सुबह सुबह जो छू लेते हो, तुम इस तन की डाली को, प्रेम भरा आलिंगन करता, ज्यों भंवरा फुलवारी को। प्रथम मिलन मधुमास की रातें, इतनी जीवन की सौगातें, तुम को पाया अब पाना क्या, सब पूरी मन की फरियादें, सब मधुमय है जीवन लय है, अमर हमारा ये परिणय है, तुमसे मेरा तन मन रोशन, भूल ही बैठी दीवाली को। सुबह सुबह जो छू लेते हो, तुम इस तन क...