रूह का पासवर्ड 299
ये विरह नहीं, ये एक स्क्रीन फ़्रीज़ है,
जहाँ मैं हूँ जहाँ तुम, पर टच में ग्लिच है।
रिश्ते की ये चैट हिस्ट्री अब भी खुली पड़ी,
किसी इमोजी पर मेरा न, नाम स्टिच है।
तेरे चेहरे की वो साफ़ HD क्वालिटी,
मेरी पलकें आज भी ऑटो-लोड कर लेती।
पर जब आवाज़ सुनने की आती है बारी,
तो हर बार वही नो-सिग्नल वार्निंग देती।
तुम जैसे हो कोई इनबिल्ट एप्लीकेशन,
जिसे डिलीट करने का ऑप्शन नहीं होता।
मेरा दिल तुम्हारे पुराने वर्ज़न पर अटका हुआ है,
तभी नए ज़माने का मैं कोई फोन नहीं लेता।
ये दूरी नहीं—ये है वक़्त का फ़ायरवॉल,
ये वायरस नहीं, खिड़की का है न्यू इंटरफेस।
और इंतज़ार है उस यूनिक पासवर्ड का,
जो तुम्हारी रूह के कीबोर्ड पर है कहीं ट्रेस।
लेकिन, मेरी हार्ड डिस्क के हर एमबी में,
एमबी ही नहीं—सुनो, हर एक बिट में।
बस तुम्हारी आँखों का बाइनरी कोड लिखा है,
तुम्हारी मुस्कुराहट बहती है मेरे हर सर्किट में।
ये सपने नहीं—प्यार की बैकअप फ़ाइलें हैं,
जहाँ हर रात डाउनलोड होता है तेरा ही नाम।
सुबह आँख खुलते ही रोज एक एरर आता,
क्योंकि दिल में अब भी है तेरा आउटडेटेड प्रोग्राम।
मेरी रातें तेरी वॉइस-नोट की तरह हैं—
बस एक लूप में चलती हुई, पूरी ख़ामोश।
मेरा जीवन अब कोई लाइव-स्ट्रीम नहीं,
ये एक ब्लैक-आउट है, लंबा, ठहरा, बोझ।
तेरी यादों का सारा डेटा सँभालकर,
मैंने, खुद को रीड-ओनली फ़ाइल बनाया।
कि, बाहर का कोई भी मुझे सर्च न कर पाए,
बस तेरा ही एक्सेस, तेरा सिक्योरिटी-कोड लगाया।
अब एक ही चाहत है मेरी,
कभी इस पूरे सिस्टम को करूँ री-बूट।
तेरी यादों के हर वायरस को मिटाकर,
नया सॉफ़्टवेयर डालूँ, जो हो अपडेटेड, प्योर और क्यूट।
काश, री-बूट होकर भी, तुम ही मेरे होम-स्क्रीन पर,
डिफॉल्ट इनबिल्ट एप की तरह चमकते रहो।
पर दिल कहता है—
डिवाइस तेरा है…
कनेक्शन भी तेरा…
और ये प्री-सेट ट्रिगर क्रैश भी… तेरा ही।
सच कहूँ तो,
ये क्रैश बस एक ज़िद है तुम्हारी—
जो तुमने ही अलार्म की तरह,
मेरी ज़िंदगी में सेट किया है।
और… दर्द का ये ऑटो-इवेंट,
सिर्फ़ मुझे ही जगाता है—
हर रात,
दुनिया के सो जाने के बाद।
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