यकीं है मुझको 294

सुरमई शाम ग़ज़ब ढ़ाएगी, यकीं है मुझको,
बात ये याद बहुत आएगी, यकीं है मुझको।

जिसपे करता हूँ उजड़ती है यकीं की खेती,
तू भी ये रीत निभाएगी, यकीं है मुझको।

सुन जरा वक्त बुरा आने दे फिर यही होगा,
तू मुझे छोड़ के जाएगी यकीं है मुझको।

ये जहान सच है, फरेबी है, मनमीत-सा है?
रात हर राज बतायेगी, यकीं है मुझको।

मेरा हर सच इस जमाने में रुस्वा होगा,
झूठ हर बात कही जाएगी, यकीं है मुझको।

उसको हर हाल में बेशक चले आना होगा,
जब मेरी आह बुलाएगी, यकीं है मुझको।

कोई हो शेख-नमाज़ी या पंडित-साधु,
मौत ये रहम न खाएगी, यकीन है मुझको।

वो तो कर्मों के तराजू पर ही तोलेगा मुझे,
जात कोई काम न आएगी, यकीं है मुझको।

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