मोक्ष तजना चाहता हूँ (#304)
मैं सफलता के सफर में एक विफलता चाहता हूँ,
प्रेम का अक्षय गरल पी मैं अमरता चाहता हूँ,
चाहता हूँ जिंदगी की शाम तक तुझको निहारूँ,
मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ।
हाँ यक़ीनन तुमको पा मैं मोक्ष तजना चाहता हूँ।
क्या कहा मुमकिन नहीं है प्रेम में अमरत्व पाना,
क्या कहा जलने न देगा प्रेम का दीपक जमाना,
पर अनंत चिंगारियों-सा मैं धधकना चाहता हूँ,
मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ।
तुम व्यर्थ ही हो व्यथित कि कैसे फिर पहचान होगी,
ये तुम्हारी नील आँखें प्रेम का प्रतिमान होंगी,
मैं तुम्हें पहचानने की एक परीक्षा चाहता हूँ,
मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ।
ज्ञान और अज्ञान के इस तर्क से मैं तो विफल हूँ,
पर तुम्हारे प्रेम के मैं इस धरातल पर अटल हूँ,
छोड़ कर मैं हिम तपस्या तुममें रमना चाहता हूँ,
मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ।
लक्ष्य मेरा सच कहूँ तो हिमशिखर या क्षीर नहीं है,
है मेरा मन राधिका-सा तुम नहीं पर पीर नहीं है,
तुमको पाना मैं नहीं बस तुममें तरना चाहता हूँ,
मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ।
हो समय का काल अंतिम जब ये सृष्टि थरथराए,
ईश्वर जब खुद ही प्रलय बन इस धरा को डगमगाए,
तो उसी निष्प्राण जग में मैं भटकना चाहता हूँ,
मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ।
शून्य का ये गीत मोहक है तपस्या गान इसका,
प्रेम ने ही बस रखा है युग-युगों से मान रब का,
मैं तपोभूमि तुम्हें कर तुमसे ही वर चाहता हूँ,
मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ।
द्वार पर मैं नव सृजन के प्रेम पुरातन ले रमूँगा,
मैं अनंता के नियम से प्रेम को आगे रखूँगा,
तुम उसे ईश्वर कहो मैं प्रेम कहना चाहता हूँ,
मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ।
हाँ यक़ीनन तुमको पा मैं मोक्ष तजना चाहता हूँ।
Comments
Post a Comment