राधा रे

खनकती दूर से आई, तेरी आवाज राधा रे,
ये नापे मन की गहराई, तेरी आवाज राधा रे,
कहाँ मुमकिन बिना तेरे, किसी का श्याम को पाना,
तेरे बिन बांसुरी फीकी, तेरे बिन श्याम आधा रे।


इन्हीं कजरारे नैनों से चुरा मन थाम लेती हो,
जो मन में था छुपाया वो, कहे बिन जान लेती हो,
कि जिसकी चाह से बनती है सृष्टि, धाम सारे ये,
बना कर राधिका उसको, प्रेम का ज्ञान देती हो,
दीवानी दुनिया है जिसकी, किसी का जो नहीं होता,
तुम्हारा है वो दीवाना, तुम उसकी प्राण राधा रे।
तेरे बिन बांसुरी फीकी, तेरे बिन श्याम आधा रे।


मेरे मन में बसा दो वो, है जिसका नाम न्यारा सा,
तुम्हीं को छेड़ना पल-पल, है जिसका काम प्यारा सा,
तुम्हारा नाम ले ले कर भटकता, बृज की गलियों में,
मुझे बस चाहिए दे दो, वही घनश्याम प्यारा सा,
मेरा हर स्वप्न हो पूरा, मुझे मिल जाए हर मंजिल, 
तेरा मुझ पर जो हो जाए, अगर अहसान राधा रे।
तेरे बिन बांसुरी फीकी, तेरे बिन श्याम आधा रे।


तुम्हें पाना जो हो जाए, तो दुष्कर श्याम पा लूँ मैं,
दुखों के इस समंदर में, सुखों की खान पा लूँ मैं,
यहाँ से दूर अंबार में, जो लेटा शेष पर निष्ठुर,
उसी के सामने होकर, उसी का गान गा लूँ मैं,
जरा भी है नहीं मुश्किल मेरा भव पार हो जाना,
मुझे बस तेरा मिल जाए, अगर वरदान राधा रे। 
तेरे बिन बांसुरी फीकी, तेरे बिन श्याम आधा रे।

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