ये जीवन है (भाग 19-21)

अब तक आपने पढ़ा, रवि कुछ दिन गांव में रह कर वापस शहर लौट रहा है रास्ते में कविता को बाहर के वातावरण को देख कर बहुत खुश हो जाती है और बात करते करते रवि की गोद में ही सो जाती है। अब आगे.....

रवि ट्रेन में बैठे बैठे कविता को देख रहा था। नींद न आने के कारण वो ख्यालों में ही अपने बचपन में चला गया। दो बड़ी बहनें और  दो छोटी बहनें और सबसे छोटा भाई, यानी रवि कुछ छह बहन भाई थे। वैसे तो रवि पांचवे नंबर की संतान था लेकिन 2 बहनो की मृत्यु बचपन में हो गई थी। कुल मिलाकर अब बचे बहन भाइयों में रवि तीसरे नंबर पर था। सबसे बड़ी बहन की शादी तो पता नहीं कब हो गई थी। लेकिन उससे छोटी बहन की शादी कुछ ही महीनों पहले हुई थी। इसलिए छठी क्लास से ही उसको घर का ज्यादातर काम इसलिए करना पड़ता था क्योंकि मम्मी बीमार रहती थीं। बहन और भाई सुबह स्कूल जाते थे तो उनके लिए नाश्ता और लंच बनाना करना पड़ता था। उसके बाद सबके लिए लंच बनाना ये अक्सर करना पड़ता ही था। वैसे ये काम इतने बुरे भी नहीं कि लड़के इनसे दूर भागते फिरें। इससे रवि को खाना अच्छा खाना बनाना आ गया था। उसके बाद स्कूल का काम करना क्योंकि स्कूल दोपहर की शिफ्ट का था इसलिए सुबह उसका सारा समय खाली था। बस एक काम जो पसंद था रेडियो पर पुराने गाने सुनना। होमवर्क करते हुए वो हमेशा गाने सुनता था। बस इसी तरह का जीवन चल रहा था। पिताजी से पूरा घर कांपता था। उनके घर होते कोई खेल भी नहीं सकता था। घर में लड़के लड़की में कोई फर्क नहीं था। सब कुछ सही ही था। ज्यादा दोस्त नहीं थे क्योंकि जिस घर में रहते थे उस घर का एक हिस्सा टूटा हुआ था सब उसको भूत वाला घर ही कहते थे लेकिन बचपन से आज तक ऐसा कुछ कभी दिखा ही नहीं। रात देर रात भी जब वो उठा तब भी ऐसा कुछ महसूस नहीं हुआ था।

साल ऐसे ही बीतते रहे। मां की तबियत अक्सर खराब रहती। जीवन के वो साल बहुत अच्छे नही तो बहुत बुरे भी नहीं थे। वैसे भी रवि की चाहते बहुत ज्यादा थी नहीं। कुल मिलाकर एक संतोषी और कम खर्चीला बच्चा था। समय के साथ पढ़ाई पूरी हुई उसके बाद जैसा लगभग हर भारतीय परिवारों में होता है। जब से जॉब स्टार्ट की तब से सब कुछ सारी सैलरी फैमिली में दिया करता था। उसका अपना कोई अलग खर्चा था नहीं। सिर्फ आने जाने में जो खर्च होता था वही उसका खर्च था। कुछ समय बाद रिश्ते आने लगे और फिर कविता को देखने शहर के एक मंदिर में जाना हुआ था। 

कविता, बिल्कुल पतली दुबली, लंबी लड़की, उस समय 18 साल की थी। हरे सूट में चोटी बना कर सामने थी। सब उससे बात कर रहे थे लेकिन रवि कुछ बात कर ही नहीं पा रहा था। कविता के साथ उसकी चचेरी बहन भी थी। मां को घरेलू लड़की चाहिए थी तो हां कर दी गई। रवि अभी शादी करना चाहता नहीं था। लेकिन सबके पसंद आने पर उसने भी कुछ ज्यादा सोचने की जहमत नहीं उठाई मना नहीं। घर पर अक्सर बातें होती की शादी के बाद लड़की को सूट पहनने देंगे। पढ़ने की इच्छा होगी पढ़ने देंगें। बेटी की तरह रखेंगे। ये होगा वो होगा। जिसको देखकर लगा की ये घर बहु के लिए आदर्श घर होगा। शादी के के कुछ दिनों तक सब सही था लेकिन कुछ ही दिनों में कविता को ताने देना शुरू हो गया था। रोज की तरह उस दिन भी...

आ गए, सर पर चढ़ा लिया है तुमने। मां बाप ने कुछ सिखाया नहीं। न खाना बनाना, न कपड़े धोना, न ही कुछ और। कितनी बार बोला कि मशीन से कपड़े सही से नहीं धुलते इसलिए हाथ से धो लो। लेकिन दो कपड़े भी नहीं धुलते इन महारानी से। माँ ने आते ही शुरू कर दिया था।

तो मशीन है तो हाथ से धुलने का कोई मतलब नहीं न। रोज रोज वही बात लेकर क्यों बैठ जाते हो सब। ऑफ़िस से आओ तो बस यही बातें रोज रोज। आखिर देख तो लो। क्या हो गया है सबको। रवि ने आज तेज आवाज में बोला और चला गया।

रवि के घर आते ही हर रोज यही होता था। जबकि वो अच्छा खासा समान अपने साथ लाई थी। कविता और उसके मायके वालों के लिए उल्टा सीधा बोलना। ये नहीं आता वो नहीं करती। खाना बनाना नही सिखाया बोलना नही सिखाया। साड़ी पहनों सूट नहीं। सब बात पर ताने। यानी जो बातें पहले होती थी वो सब एकदम से उल्टे पांव सामने होने लगी। जिंदगी किसी तरह चल रही थी। रवि जब कविता को लेकर उसके मायके जाता तो उसके साथ भी वही शिकायते रखी जाती जो वो जानता था। सबको मालूम है कि ससुराल ससुराल होता है। कोई कितना भी कर ले वो कभी लड़की का घर नही बन पाता, और मायका तो जन्म से ही पराया होता है।

फिर वो हुआ जिसके बारे में सोचना या बात करना कितना मुश्किल है... वो दिन.... क्या उससे भारी दिन भी होते हैं? होते ही होंगे। शादी के एक साल बाद पता चला कविता दो महीने की प्रेग्नेंट है। रवि खुश तो था सोचा शायद अब ठीक हो जायेगा सब। लेकिन पहली बार जैसा होता है पिछले काफी दिनों से उसकी हालत काफी खराब थी, क्योंकि उसको मसालों की गंध से उल्टी हो जा रही थी। ऐसा बहुत सी महिलाओ के साथ हार्मोस में आए परिवर्तन की वजह से होता है। खाना खाया नही जा रहा था, जो मन होता वो दिया नही जा रहा था। ऊपर से हर वक्त काम से बचने के बहाने का ताना। एक्टिंग कर रही है जैसी बातें तो सारे आम की जा रही थीं। रवि के सामने ही इतनी बातें हो जा रही थी तो पीछे क्या होती होंगी। वो भी उसके साथ जिसको खुद ही पसंद करके लाये थे। वो भी तब जब वो पहली बार माँ बन रही हो। क्या माँ होने के उस अद्भुत पलों को जीने का और खुशी से जीने का हक़ सबका नहीं। कहीं ये उस परिपाटी का हिस्सा तो नही न कि हमारे सास ने हमारे साथ किया तो हम भी करेंगे। अगर ये उसी का हिस्सा है तो शायद कभी कोई बहु कभी सुखी न रहे। क्योंकि ये सीखने का समय होता है, आगे बहु जब सास बनेगी तो वो भी यही करेगी क्योंकि यही सीखा है।

कविता को कई बार खाना खाते हुए उल्टी हुई लेकिन कोई हाथ लगाने तक नहीं आता था। रवि उसका पूरा ख्याल रखने की कोशिश करता लेकिन रवि भी आखिर पूरे टाइम घर नही रह सकता था न। गर्भावस्था के शुरू के 3 महीने, वो भी पहले गर्भ में जब किसी को सबसे ज्यादा मानसिक और भावात्मक सहयोग चाहिए होता है उस समय ये सब। आखिर कैसे बहु से उम्मीद की जाती है कि वो ससुराल को अपना घर समझे, लेकिन बहु को बाहर से आया माना जाता है।

क्रमश:




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अब तक के भाग में अपने पढ़ा। रवि शहर आते हुए ट्रेन में अपनी पिछली जिंदगी के बारे में सोचता है। उसको याद आता है शादी के बाद क्या क्या हुआ। अब आगे....

कविता प्रेगनेट थी, लेकिन उसको डॉ. से खुद दिखवाने की बजाय मायके भेज दिया गया था। रवि को ये पता ही नहीं था कि आखिर आगे करना क्या है कैसे करना है। साथ ही कविता को आराम की भी जरूरत थी ये सोच कर रवि नहीं चाहते हुए भी कविता को छोड़ आया। लेकिन रवि का मन कविता के बिना बिल्कुल नहीं लग रहा था। लेकिन समाज हमेशा से मतलबी ही रहा है। बहु को डॉ. को दिखाने के नाम पर मायके भेज दिया जाएगा, ताकि लगे कितना ख्याल रखते हैं लेकिन अपनी बेटी आ जाए तो उसके ससुराल वालों को हजार बात सुनाते हुए ये बात नहीं सोचते। मां ही सबसे ज्यादा बेटी को जानती है बोलने वाले लोग, कोई कंप्लीकेशन नही है पता चलते ही बहु को वापस ले आते हैं क्योंकि घर के काम भी तो करवाने हैं। पहले दो या तीन महीने मां के पास भेज दो फिर अपने यहां लाकर काम करवाओ फिर जब उसकी हालत कुछ करने लायक न रह जाए तो मां के घर ये बोल कर भेज दो ये कह कर कि बच्चा मां के घर ही होना चाहिए। क्योंकि जब लड़की की हालत किसी काम की न रहेगी तो फिर ससुराल में रखने का क्या मतलब। उसकी सेवा कौन करेगा। साथ ही ये उम्मीद भी की ससुराल को अपना घर समझो।

जब कविता का डॉ. को दिखाने के लिए मायके जाना हुआ तो किन्हीं कारणों से कविता की हालत बहुत खराब हो गई। उसे अचानक से शाम के समय ब्लीडिंग शुरू हो गई। आनन फानन में डॉक्टर के पास ले जाने पर पता चला बहुत ज्यादा कमजोरी के कारण मिसकैरिज हो गया। बहुत ज्यादा तकलीफ में थी कविता। कमजोर तो पहले से ही थी ऊपर से ओवर ब्लीडिंग से बहुत ज्यादा कमजोर हो गई। तीन दिन हॉस्पिटल में रहना पड़ा। उसको तन की इस परेशानी के साथ, मन में ये चिंता भी थी कि सब क्या कहेंगे। सब पता नहीं इसको किस तरह से लेंगे। वैसे भी इस परेशानी के साथ भी कितने अरमान रहते हैं न मां के। बिना देखे वो ममता से एक खूबसूरत तस्वीर बना लेती है क्या क्या सोच लेती है। आह! सारे अरमान आंसुओ के साथ बह गए। रवि दुखी तो था लेकिन किसी भी हालत में कविता के सामने वो दुखी दिखा कर उसको और दुखी करना नही चाहता था। इस समय कोई कुछ भी समझाए लेकिन ये चोट वक्त के साथ ही भारती है। लेकिन रवि के घर से कोई  देखने भी कविता को देखने नहीं आया। सुना था लोग तो दुश्मन को भी देखने चले जाते हैं लेकिन...। उसपर से जब घर आया तो उसको समझाया गया की मायके वालों ने जान बूझ कर ये सब करवा दिया है। हमारे यहां तो बिल्कुल सही थी, दो ही दिन में ऐसा क्या हो गया। मुंह से कुछ शब्द ही नहीं निकल पाए थे उस दिन। बस मुँह से आह निकली और आंखों से पानी जिसको भी उसने कहीं अंदर छुपा लिया था लेकिन भीतर कुछ तो इतनी जोर से टूटा कि आवाज ने कानों को बहरा कर दिया और दिमाग को सुन्न। आखिर कैसे। कोई ऐसा सोच कैसे सकता है। कविता अस्पताल में, कोई देखने तक नहीं गया जबकि कविता का मायका कुछ 18 km से ज्यादा नहीं था। उस पर से किसी हॉस्पिटल में लेटी हुई सदस्य के बारे में ये बातें। आखिर रवि को जॉब भी देखनी थी पत्नी को भी, और उसपर से ये बातें भी। अंदर से टूट जाने पर भी कैसे खड़ा रहना पड़ता है। लेकिन सब कहां जान पाते है कि क्या टूटा और क्या जुड़ा हुआ बाकी है।

कुछ हफ्तों बाद कविता घर लौट आई। जैसे तैसे सब सही करने की कोशिश हो रही थी। लेकिन घर मे रोज का कलह होता ही रहा। इतनी टेंशन का असर रवि के काम पर भी पड़ने लगा था। घर मे हर रोज नया किस्सा। कुछ घर के बड़े लोगों ने रवि को समझाया कि औरत को अपने पैरों के नीचे रखना चाहिए सर पर नहीं लेकिन ये बात सिर्फ बहुवके लिए होती। जबकि बेटी को सिखाते कि पति को ही क्या पूरे ससुराल को काबू में रखो। क्या ये ही शिक्षा देकर हम सोचते है कि दुनियां में महिलाओ की स्थिति ठीक हो सकती है, शायद हो भी सकती हो।  क्या ये शिक्षा लेने के बाद किसी के मन में बहन या माँ या भाभी या किसी अन्य रिश्ते के लिए आदर बचेगा। क्या ये जुती के नोक पर रखना सिर्फ वाइफ के लिए है? ये सोच का ही असर है कि आज भी औरत सिर्फ उपभोग की वस्तु है, हर तरह से उसको उपयोग करो बस।

आखिर एक दिन कविता ने घर छोड़ दिया। कितना परेशान होता है कोई जब ऐसा कदम उठता है। रवि को पता चला तो वो आफिस से भागता आया। कविता को पागलों की तरह हर जगह ढूंढा लेकिन कहीं नहीं मिली। रास्ते पर चलते हुए आंखों में आंसू, उससे गीला रुमाल, तेज कदम, पूरे रास्ते को जैसे एक ही कदम में पास कर लेने की कोशिश। लेकिन हर कोशिश पूरी नहीं होती न हर कोशिश का फल मिलता है। पता नहीं कैसे रवि ने पैदल ही 10 km का रास्ता चलते हुए कविता को ढूंढते हुए, पार कर लिया। और उधर कविता पूरे दिन स्टेशन पर बैठी रही और आखिर उसने अपने घर फ़ोन किया और उसके मम्मी पापा उसको ले गए। रवि को पता चला तो उसकी जान में जान आई। वो क्या-क्या सोच रहा था, कितने बुरे ख्याल, दिल मे क्या क्या चल रहा था किसी को बताना सम्भव भी नहीं लेकिन उसके घर पहुंचने की बात पर उसके मन को शांति मिली। कविता उसकी जिंदगी की पहली लड़की थी और आखरी भी। अरेंज मेरिज में भी प्यार हो जाता है ना, इतनी जल्दी इतना गहरा। वैसे भी प्यार होने के लिए ही तो होता है। और ऐसे में कविता के जाने के बाद दिल की हालत वो ही जान सकता है जिस पर ये हालात बीते हों।

बहुत सोचने के बाद रवि ने सोच लिया था कि वो कविता के लिए ही कविता से दूर हो जाएगा। उसकी जिंदगी से चला जायेगा, ताकि कविता को आगे खुशी मिले। उसका जीवन ठीक हो जाये। कविता के दुख दूर हो जाये, वो अपने दुख कैसे भी सह लेगा। लेकिन काश ये इतना आसान होता। अपने दिल को अपने हाथों से तोड़ देना नहीं उससे भी हज़ारों गुना मुश्किल था लेकिन उसको दुखी देखने से कहीं ज्यादा आसान था कि उससे दूर हो जाएं। तभी पता चला कि कविता फिर से... फिर से माँ बनने वाली है। अब तो साथ छोड़ भी नहीं सकता और वापस भी इस नरक में नहीं ला सकता। क्या करें... इसी सोच में खाना पीना बिल्कुल कम कर दिया। उसको देख कर सब कहने लगे कि बीमार है, न बोलना न खाना। लेकिन घरवालों और रिश्तेदारों की नजर में गलत तो वही था। हर बार की तरह उसको यही बताया जा रहा था कि औरत को कैसे रखना चाहिए। यकीन मानिए ये बातें वो थी अगर सही में निस्पक्ष रूप से उसपर अमल किया जाए तो धरती पर किसी भी रिश्ते की कोई हस्ती ही बाकी नहीं रहेगी। उसे ये ताना मिलना तो आम हो गया था कि को संभाल नही सकता, उसको जूती के नीचे नहीं रख सकता तो गलती रवि की ही थी न......


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अब तक के भाग में अपने पढ़ा। रवि शहर आते हुए ट्रेन में अपनी पिछली जिंदगी के बारे में सोचता है। शादी के बाद कविता को हालत बहुत खराब हो गई थी फिर रवि ने सोच लिया था कि वो कविता से दूर हो जाएगा ताकि सबकी जिंदगी आराम से गुजरे। लेकिन तभी पता चलता है की कविता फिर से मां बनने वाली है। अब आगे,....

कविता दूसरी बार मान माँ बनने वाली थी लेकिन पहले बार को हुआ उसका डर मन में गहरा समाया हुआ था और जैसे अभी के हालात थे उसमे बच्चे को वर्तमान में चल रही मानसिक हालातो के किसी दुष्प्रभाव से बचाने के लिए अच्छे वातावरण की जरूरत थी। वैसे भी माँ की मानसिक या शारीरिक हालात सही न हो तो बच्चे के विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है इसको विज्ञान ने सिद्ध कर दिया है। अभी कविता के बच्चे के स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी था की वो खुद खुश रहे लेकिन रवि से दूर होकर वो खुश नहीं रह सकती थी। उस घर में जाकर अपनी हालात को फिर से बिगड़ने देने का रिस्क न तो वो खुद उठाना चाहती थी और रवि तो इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं था। उसने 

। दिन गुजर ही नहीं पा रहे थे। उधर कभी-कभी कोई न कोई इसको ससुराल न जाने पर टोक ही देता था। जिसका उसको बहुत दुख होता था। उसी समय रवि का ट्रांसफर शहर के दूसरे कोने की ब्रांच में कर दिया गया। वो ऑफिस घर से काफी दूर था जहां पहुंचने में कम से कम दो घंटे लग रहे थे। और देर शाम होने पर वापस आने में तीन से चार घंटे लग जाते थे। इसका असर उसकी सेहत पर पड़ने लगा। फिर रवि ने वहीं ऑफिस के पास ही किराए पर एक फ्लैट लेने का निश्चय किया ताकि वो ऑफिस समय पर जा सके और कविता को भी अपने पास रख पाए। रवि के परिवार ने भी ऑफिस के हालात को देखते हुए कोई विरोध नहीं किया। 

बैड और सिर्फ कुछ जरूरी समान के साथ रवि ने वहां रहना शुरू किया। हर एक चीज खरीद कर लानी पड़ी। गैस चूल्हे से लेकर, बर्तन, कूलर आदि सब का इंतजाम करने के बाद रवि कविता को लेकर आ गया। आज कविता बहुत दिनो बाद इतना ज्यादा खुश थी। पूरी रात वो रवि की बांहों में ही सोई रही। रवि ने दो दिन की छुट्टी ले ली थी और उसके बाद ऑफिस की दो दिन की छुट्टी थी। यानी पूरे चार दिन तक कविता रवि के पास किसी बच्चे की तरह रही। दिनो खाना भी साथ ही बनाते। जो समान बचा हुआ था वो भी साथ ही लाने जाते। धीरे-धीरे कविता ने सारा घर संवार दिया। चार दिन तो चार घंटे की तरह निकल गए। फिर जिस दिन रवि ऑफिस गया कविता का मन बहुत उदास था। लेकिन खुशी भी थी की अब को अपने घर में थी जहां सब उसका था, कोई ये कहने वाला नहीं था की ससुराल क्यों नहीं जा रही। क्योंकि हमारे समाज में लड़की मर जाए लेकिन मायके आकार रहने लगना पाप कहलाता है। रवि और कविता के अंदर एक नया अंकुर इनको अपने पास पा कर वो बहुत खुश थी। इस समय लड़की को सबसे ज्यादा जरूरत अपने साथी की ही होती है। क्योंकि उसी से वो सब कुछ कह पाती हैं लेकिन ऐसी किस्मत सभी की होती नहीं है कि उनको समझने वाला जीवन साथी मिले। लेकिन कविता के पास पहली बार कोई अपना कोई ऐसा था जिससे वो लड़ भी हक से सकती थी और जिससे प्यार भी हक से कर सकती थी। 

जब रवि ऑफिस जाता तो कविता दिन में बहुत अकेली हो जाती थी। वैसे तो रवि का ऑफिस सुबह की शिफ्ट का था सुबह 6:30 ऑफिस पहुंच कर वो तीन से चार बजे के बीच वापस आ जाता था। कविता की नई जगह पर अभी किसी से जान पहचान भी नहीं हुई थी। जब शायद सबसे ज्यादा जरूरत किसी अपने की होती है उस समय रवि और कविता के साथ कोई और न था। कविता अपने मायके रह भी लेती लेकिन वो भी इतने दिनों तक रवि से दूर होने के कारण अब उससे दूर नहीं रहना चाह रही थी रवि भी उससे दूर होना नहीं चाहता था। वैसे भी ये उन दोनो की जिम्मेदारी थी और उसको वो खुद उठाना चाह रहे थे। दोनों एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे और आने वाले का भी। कविता और रवि को बार बार पहले बार हुई बातें याद आ ही जाती थी और वो रोने लगती थी। उसको डर था कि ऐसा फिर न हो जाये इसलिए वो दोनो बहुत संभल कर रह रहे थे।
समय बीतता रहा। इस बार अभी तक सब अच्छा ही था। कविता को अपने अंदर अजीब सी हलचल बार-बार महसूस होती। जब्ब्वो खुश होती तो ऐसा लगता उसके अंदर कुछ नृत्य कर रहा है। लेकिन जब जब दुखी होती तो सब थम सा जाता था। आज दो दिन से कोई हलचल नहीं थी कविता बहुत डर गई। पहले दिन जब उसने बताया तो रवि को लगा ऐसा होता रहता होगा। लेकिन जब दूसरे दिन भी ऐसा हुआ तो रवि कविता को लेकर डॉक्टर के पास पहुंच गया। डॉक्टर ने उसका चेकअप किया और बताया कि ये सब नॉर्मल है। ऐसा होता रहता है। शाम के समय जब रवि और कविता बात कर रहे थे कविता अचानक रोने लगी। बीच बीच में वो हंसने भी लगती लेकिन आंख से आंसू बहते जा रहे थे।
'बेबी ने फिर हाथ पैर चलाए।'  बहुत पूछने पर बताया था।
'क्या करती हो डरा दिया तुमने। देखो दिल कैसे भाग रहा है।' रवि प्यार से डांटते हुए बोला क्या 
देखो पकड़ो भाग न जाए कहीं।' दिखाओ दिखाओ कह कर कविता अपने कान लगा कर सुनते हुए बोली। और जोर से हंसने लगी।
अचानक उसने रवि का सर पकड़ कर अपने पेट पर लगा दिया और सुनने को कहा। अंदर बहुत उछल कूद मची हुई थी। कविता को हल्का दर्द तो हो रहा था लेकिन वो इतनी खुश थी की उसके आगे ये दर्द कुछ भी नहीं था। वैसे भी माँ बनना सहनशक्ति की पराकाष्ठा का उदाहरण है इसलिए इसका कोई समतुल्य उदाहरण सृष्टि में मौजूद है ही नहीं।
समय-समय पर कविता डॉक्टर को दिखाती रही।  डॉक्टर की बताई तारीख से कुछ दिन पहले कविता अपनी मम्मी के यहां चली गई क्योंकि अकेले अब आगे सब संभाल पाना मुश्किल होता। कविता मायके तो चली गई लेकिन वो रोज घंटो रवि से बात करती रहती थी। आजकल मोबाइल और चैट से दूरी का अनुभव कम किया जा सकता है, लेकिन दूरी तो दूरी है।  दीपावली की उस रात को 12 बजे तक बात होती रही। सब बिल्कल ठीक था। कविता ने बहुत खुशी के साथ दीपावली की पूजा की। खूब मिठाइयां खाई। जब आतिशबाजी हो रही थी तो बेबी आवाज से शायद बार-बार डर जा रहा था इसलिए कविता घर से बाहर नहीं निकल पाई।

क्रमश:





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