तुम्हारी आँखें है गहरा सागर

एक मुसाफिर था मैं तो यारा, तुम्हें जो देखा भटक गया हूँ,

तुम्हारी आँखें है गहरा सागर, कश्ती के बिन उतर गया हूँ।


कोई कहानी मेरी नहीं थी, तुम्हीं से हो अब कोई कहानी,

भटक रही थी, करार पाये, तुम्हारी बाहों में ये जवानी,

तुम्हारी यादों में मैं जो डूबा, नजर में सबकी अखर गया हूँ।

तुम्हारी आँखें हैं गहरा सागर, कश्ती के बिन उतर गया हूँ।


बहुत सुहानी है रात बीती, तुम्हारे सपनों में खो गया था,

हुआ वो सब कुछ, जो चाह दिल की, समां बहारों सा हो गया था।

वही हैं छाए ख्याल दिल में, उन्ही में डूबा, मैं तर गया हूँ।

तुम्हारी आँखें हैं गहरा सागर, कश्ती के बिन उतर गया हूँ।


करार दे दो, बहार दे दो, मुुझे वो बाहों का हार दे दो,

जन्मो तक जो भुला ना पाऊँ, मुझे तुम्हारा वो प्यार दे दो,

सफर मेरा ये खत्म हो शायद, तुम्हीं मिले हो जिधर गया हूँ।

तुम्हारी आँखें हैं, गहरा सागर, कश्ती के बिन उतर गया हूँ।


कोई बता दे कसूर मुझसे, हुआ ही क्या जो तुम्हें है चाहा,

तुम्हारी हसरत, तुम्हारी चाहत, तुम्हारी राहों में दिल बिछाया,

तुम्हें ही पाने की चाह लेकर, समर में तन्हा मैं डट गया हूँ

तुम्हारी आँखें हैं गहरा सागर, कश्ती के बिन उतर गया हूँ।


तुम्हारी खुशबू ही छा रही है, कही जो कोई, बहार आई,

सफर भी लम्बा नहीं लगा है, तेरी जो दिल में है लौ जलाई,

तुमने मुझसे जो मुंह मोड़ा, लगा कि जैसे, बिखर गया हूँ,

तुम्हारी आँखें हैं, गहरा सागर, कश्ती के बिन उतर गया हूँ।

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