रात देखा तुम्हे 281



पूर्णिमा चाँद-सा, रात देखा तुम्हें,
प्रेम के बाग-सा, रात देखा तुम्हें,
रात देखा तुम्हें, रात रानी सी तुम,
अनछुई आस सा रात देखा तुम्हें।


देखा तुमको लगा, झुरझुरी सी हुई,
चलते चलते यूँ हीं, बेबसी सी हुई,
ये नजर प्रेम में झुक गई तो मगर,
इन निगाहों को कुछ, बेखुदी सी हुई।
आँख बहने लगी, दिल भी गीला हुआ,
बहकी बरसात-सा रात देखा तुम्हें।


हाथ में हो मोहब्बत की रेखा सी तुम,
चांदनी रात की चित्रलेखा सी तुम, 
हो रवानी तुम्हीं प्रेम के राह की,
मेरे जीवन की हो स्वर्णरेखा सी तुम।
तुमसे कैसे कहें तब से क्या हाल है,
मन के अहसास-सा रात देखा तुम्हें।


मुझको बांधो मुझे, अपना करते रहो,
प्रेम है तो न आहें, यूं भरते रहो,
जिंदगी की है, छोटी डगर ये प्रिय,
तन्हा तन्हा न इसपर यूं चलते रहो।
तेरा बंधन तो कोई शिकायत नहीं
प्रेम के पाश-सा रात देखा तुम्हें।


पाँव थक जाएं तो, मैं सहारा बनूँ
मन के मझधार का मैं किनारा बनूँ,
तेरे काँटों को पलकें, ये चुनने लगें,
तेरी हर रात का, चांद तारा बनूँ,
इतनी नाजुक हो कैसे संभालू तुम्हें,
अनछुए प्यार-सा रात देखा तुम्हें।
NM



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