सरकारों की असंवेदनशीलता
सरकारें कितनी असंवेदनशील हो सकती हैं इसका उच्चतम उदाहरण अनेको बार सामने आया है। आज से 10 साल पहले भी सैनिकों के शहादत पर सांसद कह देते थे कि सैनिक मरने के लिए ही तो नौकरी करते हैं इसकी इनको तनखाह मिलती है, और कालांतर में वो लोग मंत्री बन जाते हैं। इसमें वर्तमान सरकार को ही दोषी मानना बिल्कुल सही नहीं, इसमें हर कोई शामिल है, केंद्र की सरकार हो या राज्य की सरकारें हो, पंचायत हो, सब इसमें शामिल हैं। अफसरों की संवेदनशीलता खासकर वो अफसर जो जनता के सम्पर्क में आते हों वो कितने भी छोटे पद पर क्यों न हों लेकिन उनके झोपडी को मकान, मकान को बंगला बनते कितना समय लगता इसकी जानकारी किसको नही? हर भारतीय कभी न कभी इसका स्वाद ले ही चुका हैं। नोट बंदी, बिना गरीबो की सुध लिए लॉकडाउन लगाना, इसका ताजा उदाहरण हैं जिनसे देश की 85% आबादी किसी न किसी रूप में बुरी तरह प्रभावित हुई।
इसका ताज़ातरीन उदाहरण गंगा में बहती लाशें है जिनको किसी भी वजह से दफनाया गया हो लेकिन ये दृश्य कितना विभत्स था इस बारे में लिखना मुश्किल है लेकिन इन सब बातों से आधुनिक राजाओं पर कोई फर्क नही पड़ता कोई कितना भी जनहित की बात करे लेकिन उसका मतलब अपने हित से आगे होता ही नहीं।
जब राजा बड़ी घटनाओं पर संवेदनहीनता दिखाते हैं तो छोटी बातों पर संवेदना की उम्मीद पालना बेबकूफ होने की उच्चतर दशा को दिखाता है और हम हैं भी क्योंकि वोट देते वक्त हम ये सब बातें भूल सर्फ जाति-धर्म, अगड़े-पिछड़े, ऊंच नीच, इत्यादि के आधार पर ही तो देते आये हैं और आगे भी इसी पर देंगे।
अब असली और छोटी बात, इस बीच दिल्ली में मेट्रो लाइन दुबारा चालू होने के बाद कुछ 3 से 4 बार नई दिल्ली स्टेशन जाना हुआ, वहां शायद 5 गेट हैं जो इस्तेमाल होते थे, जैसे कि आप सब जानते होंगे नई दिल्ली पर बाहर से आने जाने वालों की काफी भीड़ रहती है लेकिन कोरोना के कारण सिर्फ एक एंट्री गेट खुला है उसपर हमेशा 90 से 100 लोग लाइन में रहते है और लाइन में कोई सोशल डिस्टनसिंग नही हो सकती क्योंकि भारी धूप में सफर की थकान के बाबजूद खड़े लोगों से ये उम्मीद करना कहीं से भी मानवीय नहीं और अंदर मेट्रो में लोगों की भीड़ है। जब भीड़ ही लगानी है तो क्यों सारे गेट नहीं खोल दिये जाते ताकि लोग कम से कम आराम से एंट्री और एग्जिट कर सकें। यही हाल हर मेट्रो स्टेशन का है और रेलवे का भी होगा।
सही भी है सरकार और उसके अफसर जिनको कभी मेट्रो से या ट्रेन या अन्य सार्वजनिक वाहनों में अपनी तशरीफ़ की टोकरी ले नहीं जानी होती तो उनको क्या फर्क पड़ता। उनको तो हमारे टैक्स के पैसे से मजे में AC और AC गाड़ियां मिली हैं तो उनको हम टुच्चे लोगों की परवाह क्यों हो। सही भी है हम बने ही लात खाने के लिए हैं तो कभी मेट्रो में मारो, कभी बस में कभी गाड़ियों से कुचल दो तो कभी खाने की वजह से मार दो। हम जनता की औकात राजाओं की नज़र में कीड़ों से ज्यादा नहीं।
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