आओ फिर "जस्टिस फ़ॉर ..…...." मुहिम चलाये

एक और बच्चे की हत्या, फिर से वही कहानी, फिर से मोमबत्ती रैली। होना तो चाहिए कि सख्त सजा मिले लेकिन जब हम रेपिस्ट को, गुंडों को चुन कर मंत्री बनवा देते है, तो उनसे ये उम्मीद करना कि  किसी को सजा मिलेगी अपने मन को भरमाना है। जब कोई खुद गुंडा हो, अपराधी हो, तो वो अपराधियों को बचाएगा ही। चोर चोर मौसेरे भाई की कहावत क्यों भूल जाते हैं हम। बस निकलते है मोमबत्ती लेकर। चलो मुहिम चलाते हैं "जस्टिस फ़ॉर .....।" नाम कुछ भी लिख लो क्या फर्क पड़ता है, इसलिए मैंने ...... लगा दिए। इससे पहले कितने मासूमो के रेपिस्ट को सजा हुई, जो अब होगी, और हाँ दिल पर हाथ रख कर कौन कौन ये कह सकता है कि वोट देते हुए उसने हिन्दू मुस्लिम, जाति, धर्म, पैसे, को देखकर वोट नही दिया? विधायक या संसद या पार्षद को उसके चरित्र को देख कर वोट दिया उसके काम को देखकर वोट दिया?

यकीन मानिए हम सब दो दिन चिल्लायेंगे, बस फिर चुप, क्या हुआ आसिफा वाली मुहिम का? अरे नही यार वो तो मुस्लिम थी उसकी बात नही करते क्योंकि ये हिंदुस्तान है और मुस्लिम की बात करना देशद्रोह। तो मुजफ्फरपुर के  shelter home case को याद करिए, क्या हुआ, जिन्होंने दोषियों को बचाया, जो मंत्री थे, उनकी पार्टी चुनाव जीत गई है। तो यकीन मानिए कोई फर्क नही पड़ता समाज को। ये वही समाज है जो आसाराम को बचाने, राम रहीम को जैसे रेपिस्ट को बचाने को खड़ा था। आज भी लोग इनको भगवान मान कर पूज रहे है, और उम्मीद पाल रहे है कि रेपिस्ट को सजा होनी चाहिए।

आबादी बहुत है हमारे देश मे, ये दो या चार या कुछ हज़ार मार दिए जाने से कुछ नही होने वाला। वैसे भी मानव का स्वभाव ऐसा है जो चीज़ ज्यादा होती है उसकी फिक्र नही करता। पेड़ बहुत हैं, खत्म कर रहा है, पानी बहुत है गंदा कर रहा है, हवा में ऑक्सीजन बहुत 21% है तो बेधड़क कार्बन बना रहा है। आबादी बहुत है तो मारने वाले को सजा क्यों? क्यों मिलनी चाहिए सजा? इसलिए कि हम मोमबत्ती लेकर निकलने वाले है। सबको पता है, मोमबत्ती यात्रा होती है तो अधिकतर वहां इसलिए नही जाते कि मुहिम का साथ देना है बल्कि इसलिए जाते है प्रोफाइल फोटो लगानी है। सेल्फी लेनी है। और अगले दिन सब नार्मल। यकीन न हो तो देख लीजिएगा। जब तक इस खबर से TRP मिलेगी तब तक न्यूज़ में आएगी और उसके अगले दिन से खबर गायब, क्योंकि ऐसी खबरों को लंबा चलने से सरकार चाहे वो किसी की भी हो उसकी बदनामी होती है। 

चलिए चलते हैं नए अभियान पर...., अभियान खत्म। चलिए इंतज़ार करते है नए अभियान का। एक और आसिफा का, एक और ट्विंकल का, एक और निर्भया का ताकि प्रोफाइल फोटो मस्त आये, हम समाज को दिखा सके हम कितने सोशल है। समाज के लिए कितने फिक्रमंद। इंसान वैसे भी सामाजिक प्राणी है। याद आया न स्कूल में पढ़ी थी ये लाइन। सामाजिक, मतलब सोशल मीडिया वाला सामाजिक। 

मेरा मानना है कि सबको एक बोर्ड पर "जस्टिस फ़ॉर" को बोर्ड पर पेंट करवा लेना चाहिए पक्के वाला चमकदार काला पेंट, और नाम की जगह खाली छोड़ देनी चाहिए, वैसे ये काम फोटोशॉप से भी हो सकता है। अब कौन बार-बार बोर्ड बनवायेगा। नाम खुद लिख देंगे टेम्परेरी इंक से जो साफ हो जाये, फिर दूसरा नाम भी तो आना है जल्दी ही। वेटिंग फ़ॉर नेक्स्ट।

वैसे भी, ये मोमबत्ती यात्रा मोमबत्ती इंडस्ट्री के लिए वरदान है। दीपावली के अलावा अब मोमबत्ती कौन लेता है। देश में 100% बिजली के बाद मोमबत्ती की बिक्री समाप्त हो रही थी तो अब इन रैलियों ने उनमे जीवन फूंकने का नही तो साँस के चलते रहने का इंतज़ाम कर दिया है, और हाँ साथ में बोर्ड बनाने वाले, टेक्सी, रिक्शा वालो की भी अच्छी इनकम हो जाती है तो ऐसे रैलियां करते रहने से अर्थव्यवस्था को बूस्ट मिलता है।

सॉरी ट्विंकल, सॉरी आसिफा, सॉरी हर किसी को जो इस तरह की घटनाओं का शिकार है। हमने ही ये समाज बनाया, सरकार बनाई जो तुमको बचा न सके, और दोषियों को सजा दिलवाने की बजाए उनको बचाया। सॉरी।

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