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मैं अधूरा हो गया हूँ (293)

तुम हो छोले, मैं भटूरा हो गया हूँ, तुमसे मिलकर मैं चटोरा हो गया हूँ, बिन तुम्हारे हो गया आधा अधूरा तुम हो चटनी मैं पकौड़ा हो गया हूँ। कल सुनो, मैं भी चलूँगा साथ तेरे, हाथ में देना सजनिया, हाथ मेरे, दूर तक चलना, जहाँ कोई नहीं हो, कल की छुट्टी, मैं रहूँगा साथ तेरे। हाँ वही, खट्टे-से पानी की वो पूड़ी, जिसके बिन शामें तुम्हारी हैं अधूरी। और तीखा और खट्टे की दुहाई, मुझको भी भाने लगी है वो खटाई, हाँ तुम्हीं-सा मैं तो थोड़ा हो गया हूँ, तुमसे मिलकर मैं चटोरा हो गया हूँ। मोमो की खुशबू में डूबी तुम खड़ी थीं, और होठों पर लगी चटनी तुम्हारी, खो गया था दिल, तुम्हें तो याद है न, जब मिली थीं तुम मुझे वो शाम प्यारी, आज तक भूला नहीं मन साथ तेरा, जब लिया हाथों में तुमने हाथ मेरा। याद है मुझको वो तेरी आँख का रंग, तेज मिर्च से था बदला गाल का रंग, मोमो की चटनी में थोड़ा खो गया हूँ, तुमसे मिलकर मैं चटोरा हो गया हूँ। बाग में हैं आज कल चर्चे तुम्हारे, जल रही हैं देख कर तुमको बहारें, इन निगाहों में छुपा कर बिजलियाँ तुम, कर रही हो पास आने के इशारे, नागिनों से पाश में ले खींचती हो, नयनों को तुम रात करके मींचती हो।...

गीत कोई तुम गाओ...

गीत कोई तुम गाओ, और इस दिल को बहलाओ,  सब भूलूँ जगत की रीते, तुम भी जग को बिसराओ।  मैं दीप करूँ तन-मन को, तुम दीप शिखा बन कर के,  पतझड़-सा है ये जीवन, तुम फूलों-सा महकाओ। है चंद्रिका सी शीतल, ये रातें खूब जलाएँ,  तुमसे दूर ओ साजनी, रजनीगन्धा ना भाये,  बुझता उम्मीद का दीपक, इतनी लंबी है दूरी, तुम बनकर घटा सुहानी, बस प्रेम सुधा बरसाओ,  मैं दीप करूँ तन-मन को, तुम दीप शिखा बन जाओ। जो जन्मों की है दूरी, तो जीकर क्या है करना, तुम बिन ओ मेरे साजन, मुश्किल बहुत है मरना,  है जीवन ये एकांकी, ढलते सूरज की छाया,  तुम आ जाओ जीवन में, एक नया सवेरा लाओ।  मैं दीप करूँ तन-मन को, तुम दीप शिखा बन जाओ। दिल कब से ढूँढ रहा है, कोई मार्ग तुझे पाने का,  कहीं ऐसा न हो जाए, हो वक्त मेरे जाने का,  मैं दुनिया छोड़ ना जाऊँ, तुझसे मिलने से पहले,  तुम जल्दी से आकर बस, मुझको अपना कर जाओ।  मैं दीप करूँ, तन-मन को, तुम दीप शिखा बन जाओ।

प्रेम से ज्यादा पैसे का 292

प्रेम से ज्यादा पैसे का जीवन पर अधिकार, है मूरख जो ढूँढता इस दुनिया में प्यार, लेन देन ही बन गई जीवन का आधार, है मूरख जो ढूँढता इस दुनिया में प्यार। साल महीने छह हुए होती है अब ऊब, जन्मों की कसमें कभी खाई मिलकर खूब, अब तो जीवन लग रहा हर पल है बेज़ार, है मूरख जो ढूँढता इस दुनिया में प्यार। मंजिल को जो साथ में चले खींच नव लीक, सुगम हुआ जब रास्ता अहम बना मनमीत, लघुता के अभिमान का अम्बर-सा विस्तार  है मूरख जो ढूँढता इस दुनिया में प्यार। हाँ में हाँ कहते रहो तब तक सबका साथ, मीत बनेंगे खास सब अद्भुत-सा अहसास, ज्यों मतलब पूरा हुआ बनी दोस्ती भार, है मूरख जो ढूँढता इस दुनिया में प्यार। इस दुनिया का खेल है भावों से बस खेलना, उजियाले का पंथ दिखा अँधियारे में ठेलना, मृदुल भावना तोलते जैसे हो व्यापार, है मूरख जो ढूँढता इस दुनिया में प्यार। अपनी करनी की नहीं पर करनी की नाप झूठा सबको कह रहे झूठ को अपनी ढांप, सागर मध्य उतारते, कह खुद को लाचार, है मूरख जो ढूँढता इस दुनिया में प्यार।

सुला दे मुझको 291

तेरे होठों की ये मिठास चखा दे मुझको, अपनी प्याली से एक घूंट पिला दे मुझको। आज की रात ये आई है बड़ी मुद्दत में, अपने पहलू में फिर आज सुला दे मुझको। फ़ासला ही अगर रखना है तुझे मुझसे, इससे अच्छा तो निगाहों से मिटा दे मुझको। इन नजारों में नहीं, तुझमें कशिश है जो सनम, मान जा दिल में कहीं अपने बसा ले मुझको सुन कोई राज छुपाया ही नही तुझसे  कभी कहना चाहे जो तेरा दिल वो बता दे मुझको। थक गया हूँ मैं सपनों का वजन ढ़ोते-ढ़ोते, ख्वाब जिसमें न हो नींद ऐसी सुला दे मुझको।

अरमानों पर पानी है 290

क्या हुआ जो दिल के सारे अरमानों पर पानी है, दिल ने तेरे इश्क से मेरे, रार ये कैसी ठानी है, ऐसे तूने अरमानों को खत्म किया है सीने में, दुनिया कहती तुझपर मरना, मेरी बस नादानी है। दुनिया के कुछ कह देने से, दिल बोलो कब डरता है, इश्क तो वो है सदियों से जो, जूती पर जग रखता है, जग के सारे समझाने से, कैसे माने दिल मेरा, दुनिया को ठुकरा देने की, जब इस दिल ने ठानी है। रोज चले आते समझाने, दिल ने कब कुछ पूछा है, डर लगता है जग को सारे, ख्वाब जो मेरा टूटा है, जग को डर है लीक नई फिर, इश्क मेरा ये गढ़ लेगा, खुद की लाज बचाने को ही, जग की आनी-जानी है। तुम भी सुन लो सदियों तक, तुमको तो आना होगा, प्रीत के मेरे अवशेषों पर जग को झुक जाना होगा, द्रोह सुनो मेरा अविचल है, जग की कुंठित रीतों से, जो मन को मंजूर नहीं वो, बात कब दिल ने मानी है। आज कहो तो जग को जाकर, सारा हाल बता दूँ फिर, तुमसे प्रेम मुझे कितना है, जाकर क्या दिखला दूँ फिर, लेकिन जग से कह देने में, प्रेम को क्या मिल जाएगा, तू न समझा, दुनिया से फिर, कुछ कहना बेमानी है

हर्ष विकंपित हो रही हैं..p 289

हर्ष विकंपित हो रही हैं, मन में लो सारी व्यथाएं  राम तुम आए हो गूंजें, प्रेम से सब दस दिशाएं। हम व्यर्थ का ज्ञान भर मन, तेरा-मेरा कर रहे हैं, राम तुम कर दो कृपा बस, ज्ञान ऐसा भूल जाएं। कुछ नहीं ऐसा जगत में, जिसमे मेरे नाथ न तुम कैसे मानूं आ रहे अब, सदियों तक तुम थे न आए। हम सुनो! अज्ञान को ही, ज्ञान अपना कह रहे हैं, ज्ञान गीता का भुला कर, रच रहे कलि की ऋचाएं। तुम प्रभु जो सोच भर लो, सृष्टि नव निर्माण होगी, क्यों प्रभु अभिमान इतना, घूमता दस सिर उठाए। नारायण तुमको किया है, दूर नर से खेल देखो, खेलती माया महाबली, कैसे मन खुद को बचाए। क्या धरा के पुण्य उदय को, कल्कि तक रुकना पड़ेगा, राम बजरंगी से कह दो, पाप सब मन के मिटाएं।

P287 न सफर में दिल को सकून था

न सफर में दिल को सुकून था,  न तो मंजिलों पर करार है,  तेरे इश्क का, तेरे इश्क का, तेरे इश्क का ये खुमार है। ये सुनो घटाओं की अनकही, मेरे दिल में उतरी है रात भर, मेरे साथ होकर भी दूर क्यों, तेरा प्यार कैसा ये प्यार है। न सफर में दिल को सुकून था,  न तो मंजिलों पर करार है। सुनो सिलसिला ये बना कभी, तुझे देखा मैंने था रात भर, मेरी जिंदगी की नसीब से, ठनी कैसी चिर ये रार है। न सफर में दिल को सुकून था,  न तो मंजिलों पर करार है। कभी रात-दिन में फर्क न था, तेरा मिलना मुझसे अजब ही था। तू बता तो दिल के करार में, पड़ी कैसी अब ये दरार है न सफर में दिल को सुकून था,  न तो मंजिलों पर करार है। कोई बात है तो बता तो दे, किसी राज का तू पता तो दे, कुछ किया नहीं तू गया बदल, बिन तेरे ये सूना दयार है। न सफर में दिल को सुकून था,  न तो मंजिलों पर करार है। अब सवाल है मेरी जिंदगी, अब सवाल है मेरी बंदगी, अब सवाल सांसों की डोर ये अब सवाल दिल में हजार है। न सफर में दिल को सुकून था,  न तो मंजिलों पर करार है।