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झड़ते फूलो की गाथा

तन का क्या है, तन तो निशदिन, झड़ते फूलो की गाथा है। मन का मीत बनो तुम प्रियतम, मन प्यासा जीवन प्यासा है। कुछ दैहिक क्षण भर के सुख को, अन्तिम मान रही है दुनिया, लेना-देना, खोना-पाना, ...

अपराधी

फूल को सुन्दर फूल कहा, रूप, अप्सरा का रूप कहा चांद भले पत्थर ही सही, उसको भी कितना खूब कहा, जहान मे सुंदर है जो, तेरा है प्रारूप कहा, खुद पर जो अभिमान लिखा, देश का स्वाभिमान लिखा, ज...

बिखड़ी पंखुड़ियां : वावफा थे

हम वावफा थे, ना तेरी बेवफाई पर रोए, आदत थी तन्हाई की, ना तेरी जुदायी पर रोए, क्या कहेगा जमाना, मेरे महबूब को, बस यही सोच कर, ना तेरी सगाई पर रोए।

मैं फिर आऊंगी

उस सुंदरता का चातक सा मै, एक उसे देख लेने की चाह मे, आस लगाये एकटक निष्क्रम, घट, पल, घड़ी, पहर, दिवस, निष्प्राण से गुजर रहे, वो सृष्टि के कुछ मधुरतम शब्द, "मैं फिर आऊंगी" तुम्हारे सुन्...

दर्पन कितने तोड़ गई मैं

पिया मिलन की बेताबी में, लोक लाज कर गोल गई मैं, वो आयें ये सुनकर पगली, घूंघट के पट खोल गई मैं। कब से आस लगाये बैठी, अब आओगे, कब आओगे, शुष्क मरुभूमि जीवन पर, बादल बनकर तुम छाओगे, पिया मिलान की बस आहट पर, सपनो में रंग घोल गई मैं। वो आयें ये सुनकर पगली, घूंघट के पट खोल गई मैं। फल्गुल की मनभवान रातें, दीप जले ज्यों तन जलता था, जब से दूर गये तुम साजन, आन मिलो ये मन कहता था, खेलो मुझसे जीभर कर रंग, हाय! ये क्या-क्या बोल गई मैं। वो आयें ये सुनकर पगली, घूंघट के पट खोल गई मैं। काजल बिंदिया, लाली, खुशबू, तन को मन को, खूब सजाये, बाट जोहती कब से बैठी, मैं राहों पर नैन लगाये, तेरे सिवा कोई देख न ले बस, दर्पन कितने तोड़ गई मैं। वो आयें ये सुनकर पगली, घूंघट के पट खोल गई मैं।

बिखड़ी पंखुड़ियां : दिल सुंदर है

दिल सुंदर है, तो दुनिया की कही, बातों से क्या,लेना मुझको। हो साथ तुम्हारा, बहके हुए, जज्बातों से क्या लेना मुझको। हर सांस से आती है ये सदा,  तुम साथ रहो अंत सांसों तक। तुमसे मिल...

महिला दिवस

आज उठे सुबह, तो हर ओर, एक ही रौनक छायी थी, व्हाटसप, डूड़ल, फेसबुक पर, महिला दिवस की बधाई थी, नई नई ये रीत चली है, या, बदलाब की नई अंगराई थी? अखबार मैगजीन, और टीवी पर, सबने दी ये बधाई थी। पी...