निर्मल गंगा एक ऐसा स्वप्न है जिसके लिए भागीरथ जैसा तप जरूरी है और आज कोई कितना भी इनकार करे लेकिन सब "गंगा मईया" सिर्फ राजनितिक स्वार्थ के लिए ही बोलते हैं, मेरा यह कथन किसी पार्टी या किसी सरकार के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। मैली नदियां स्वार्थ सिद्धि की ऐसी कामधेनू बन गई है कि जिसे कभी कोई स्वच्छ नहीं करना चाहेगा क्योंकि कोई सोने का अंडा देने वाले मुर्गी की बिरयानी नही बनाई जाती। सत्य मानिये तो आज तक नदियों की सफाई के नाम पर जितना अपार धन खर्च क्या गया है उसमे संपूर्ण गंगा को 2-4 बार दुबारा खुदवाया जा सकता था। कोई ये कहे कि सिर्फ 2 वर्ष में गंगा-यमुना या कोई नदी साफ होगी तो वर्तमान में यह असंभव है , अभी तो रिपोर्ट आने में ही सालों लगते हैं। उसके लिए इच्छा शक्ति चाहिए, वोट का मोह त्यागना होगा, कुर्सी का मोह छोड़ कर निर्णय लेने होंगे। जो हिम्मत न पिछली सरकारों में थी न इस सरकार में दिखती है। जैसे ही किसी भी नदी को साफ की बात आती है सब संस्थाऐं नदियों की गंदगी के मुद्दे को धार्मिक रंग देने लगती है ताकि लोग इसको लेकर उदासीन हो जाए। इसके लिए सब का पहला वाक्य है कि नदियों मे...
अब सफलता के सफर में एक विफलता चाहता हूँ, प्रेम का अक्षय गरल पी मैं अमरता चाहता हूँ। चाहता हूँ जिंदगी की साँझ तक तुझको निहारूँ, मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ। हाँ यक़ीनन तुमको पा मैं मोक्ष तजना चाहता हूँ। क्या कहा मुमकिन नहीं है प्रेम में अमरत्व पाना, क्या कहा जलने न देगा प्रेम का दीपक जमाना, पर उम्मीदें भर के मन में, स्वयं को करके समर्पित, बस अनंत चिंगारियों-सा मैं धधकना चाहता हूँ, मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ। तुम व्यर्थ ही हो व्यथित कि कैसे फिर पहचान होगी, ये तुम्हारी नील आँखें प्रेम का प्रतिमान होंगी। जन्मों तक मुझको भले ही, करनी हो तेरी प्रतीक्षा, मैं तुम्हें पहचानने की एक परीक्षा चाहता हूँ, मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ। ज्ञान और अज्ञान के इस तर्क से मैं तो विफल हूँ, पर तुम्हारे प्रेम के मैं इस धरातल पर अटल हूँ। प्रेम में मुझको नहीं अब देवत्व की अभिलाषा, छोड़ कर मैं हिम तपस्या तुममें रमना चाहता हूँ। मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ। लक्ष्य मेरा सच कहूँ तो हिमशिखर या क्षीर नहीं है, है मेरा मन राधिका-सा तुम बसे ...
सफर तू क्यू हैरान है क्यू परेशान है, जिन्दगी के सफर की ये पहचान है तू जो बीती उसी को बस सच मानता है, सच तो आगे भी है, तू बस अनजान है। क्या हुआ जो, तेरा दिल ये टूट गया, क्या हुआ जो, तेरा ख्बाव टूट गया सब कुछ मिलता नही ये भी सच्चाई है, वो तेरा न था जो तुझसे छूट गया। सबकी हसरत यहाँ तो अधूरी है बस, कहाँ सम्पूर्ण कोई इन्सान है... खुद ही सहने हैं गम के थपेरे सभी, कोई दुख में तेरा साथ देगा नही, खुद ही जाना तुझे पार मझधार के, थाम ले कोई, ये अक्सर होगा नहीं, जो तेरे साथ है, वो भी हो कि न हो, बस बदलना ही, वक़्त की पहचान है..... ये भी माना अंधेरा घना छा गया वो जो छूटा तुझे याद फिर आ गया, अच्छी यादों को दिल में बसा कर रखो, फेंक दो जो तुम्हारी हसीं खा गया, तेरे आगे है कल का सबेरा नया, तेरा चलना ही मानव, तेरी शान है.....
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