मैं सफलता के सफर में एक विफलता चाहता हूँ, प्रेम का अक्षय गरल पी मैं अमरता चाहता हूँ, चाहता हूँ जिंदगी की शाम तक तुझको निहारूँ, मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ। हाँ यक़ीनन तुमको पा मैं मोक्ष तजना चाहता हूँ। क्या कहा मुमकिन नहीं है प्रेम में अमरत्व पाना, क्या कहा जलने न देगा प्रेम का दीपक जमाना, पर अनंत चिंगारियों-सा मैं धधकना चाहता हूँ, मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ। तुम व्यर्थ ही हो व्यथित कि कैसे फिर पहचान होगी, ये तुम्हारी नील आँखें प्रेम का प्रतिमान होंगी, मैं तुम्हें पहचानने की एक परीक्षा चाहता हूँ, मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ। ज्ञान और अज्ञान के इस तर्क से मैं तो विफल हूँ, पर तुम्हारे प्रेम के मैं इस धरातल पर अटल हूँ, छोड़ कर मैं हिम तपस्या तुममें रमना चाहता हूँ, मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ। लक्ष्य मेरा सच कहूँ तो हिमशिखर या क्षीर नहीं है, है मेरा मन राधिका-सा तुम नहीं पर पीर नहीं है, तुमको पाना मैं नहीं बस तुममें तरना चाहता हूँ, मोक्ष को बस त्याग कर मैं प्रेम करना चाहता हूँ। हो समय का काल अंतिम जब ये सृष्टि थरथराए, ...
निर्मल गंगा एक ऐसा स्वप्न है जिसके लिए भागीरथ जैसा तप जरूरी है और आज कोई कितना भी इनकार करे लेकिन सब "गंगा मईया" सिर्फ राजनितिक स्वार्थ के लिए ही बोलते हैं, मेरा यह कथन किसी पार्टी या किसी सरकार के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। मैली नदियां स्वार्थ सिद्धि की ऐसी कामधेनू बन गई है कि जिसे कभी कोई स्वच्छ नहीं करना चाहेगा क्योंकि कोई सोने का अंडा देने वाले मुर्गी की बिरयानी नही बनाई जाती। सत्य मानिये तो आज तक नदियों की सफाई के नाम पर जितना अपार धन खर्च क्या गया है उसमे संपूर्ण गंगा को 2-4 बार दुबारा खुदवाया जा सकता था। कोई ये कहे कि सिर्फ 2 वर्ष में गंगा-यमुना या कोई नदी साफ होगी तो वर्तमान में यह असंभव है , अभी तो रिपोर्ट आने में ही सालों लगते हैं। उसके लिए इच्छा शक्ति चाहिए, वोट का मोह त्यागना होगा, कुर्सी का मोह छोड़ कर निर्णय लेने होंगे। जो हिम्मत न पिछली सरकारों में थी न इस सरकार में दिखती है। जैसे ही किसी भी नदी को साफ की बात आती है सब संस्थाऐं नदियों की गंदगी के मुद्दे को धार्मिक रंग देने लगती है ताकि लोग इसको लेकर उदासीन हो जाए। इसके लिए सब का पहला वाक्य है कि नदियों मे...
यादें तेरी बाहों में मे रा , दिल का ठिकाना याद है, तू भले भूली, मुझे, गुजरा जमाना याद है। हमने खायी थी कसम ये, साथ जन्मो-जन्म का है, तू जिसे भूली, मुझे हर, वो फसाना, याद है। कौन कहता है जमाना ये, याद कुछ रखता नहीं, जग को तो अब तक हुआ जो, हर दिवाना याद है। तू भले माने न माने, प्यार तू समझी नही, तेरे दिल पर अब भी चलता, मेरे दिल का राज है। दिल न भूला आज तक वो, तुझसे मिलने का मजा़, तेरे दिल में भी अभी तक, जगह मेरी कुछ खास है। तू भले समझे न समझे, दिल तेरा सब जानता है, गूंजती दिल में तेरे सुन, मेरी ही आवाज़ है। आज भी आया नहीं, इकरार वाला ख़त तेरा, घर मेरा उजड़ा हुआ बस, ये जहां आबाद है। किससे कहता दिल की बातें, मैं छुपाता ही गया, तू ही जब समझा नहीं, जग से क्या फिर आस है। कल मिले तो शर्म से खुद, झुक गई आँखें तेरी, तेरी नजरों को अभी तक, प्यार का अहसास है।
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