पिया मिलन की बेताबी में, लोक लाज कर गोल गई मैं, वो आयें ये सुनकर पगली, घूंघट के पट खोल गई मैं। कब से आस लगाये बैठी, अब आओगे, कब आओगे, शुष्क मरुभूमि जीवन पर, बादल बनकर तुम छाओगे, पिया मिलान की बस आहट पर, सपनो में रंग घोल गई मैं। वो आयें ये सुनकर पगली, घूंघट के पट खोल गई मैं। फल्गुल की मनभवान रातें, दीप जले ज्यों तन जलता था, जब से दूर गये तुम साजन, आन मिलो ये मन कहता था, खेलो मुझसे जीभर कर रंग, हाय! ये क्या-क्या बोल गई मैं। वो आयें ये सुनकर पगली, घूंघट के पट खोल गई मैं। काजल बिंदिया, लाली, खुशबू, तन को मन को, खूब सजाये, बाट जोहती कब से बैठी, मैं राहों पर नैन लगाये, तेरे सिवा कोई देख न ले बस, दर्पन कितने तोड़ गई मैं। वो आयें ये सुनकर पगली, घूंघट के पट खोल गई मैं।