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बुरा इससे, क्या होगा मेहब्बत में

बेदर्द अब ज्यादा बुरा इससे, क्या होगा मेहब्बत में, जिसे चाहा भुला सबको, उसने ही दुत्कारा है। मैं लाख करूं मिन्नत, कोई फर्क नहीं उसको, जब जब भी किया सजदा, उसने धिक्कारा है। पर क...

फाल्गुन का मादक मस्त महीना

होली फाल्गुन का मादक मस्त महीना, फिर आया मन बहकाने को। चल गोरी तैयार तू हो जा, रंग खेलन, गले लगाने को। चल भूल जगत के सब पहरे, हम आज देर तक रंग खेलें। है नीरस जीवन का हर पल आ, प्यार का इसमें रस घोलें। घर रोके या, जग रोके, चल छोड़ के इस, अफ़साने को। चल गोरी तैयार तू हो जा, रंग खेलन, गले लगाने को। उन्मुक्त सरिता सम यौवन, मदमस्त चले तू छम, छम, छम। सब भूल चली आ ओ सजनी, हर ओर उड़े फाल्गुन के रंग। मैं भूल गया तकरार तेरी सब, तू आ फिर मुझे सताने को। चल गोरी तैयार तू हो जा, रंग खेलन, गले लगाने को। मनमीत बने बस तू मेरी प्रियतम तेरा बन जाऊंगा जग चाहे जितना भी रोके, तुझे प्रेम रंग, रंग जाऊंगा, मैं ठान चुका इस फाल्गुन में, जग से हर, रार उठाने को, चल गोरी तैयार तू हो जा, रंग खेलन, गले लगाने को। तू डर न तेरे चेहरे पर , रंग लाल हरा मैं लगाऊंगा, बस मन में तेरे नई उमंग, उत्साह नया मैं जगाऊँगा, उठ आँखों में भर ले सपने, हंस सबको मुंह चिढ़ाने को। चल गोरी तैयार तू हो जा, रंग खेलन, गले लगाने को।

दो कदम साथ तो दे

कोई तो तेरा भी है, इंतजार करता, तू बस मोहब्बत से, आवाज तो दे।।। ये माना गलत था, जो तुझको मिला था, तू फिर से तेरे दिल को, नया साज़ तो दे। और कब तक तू बैठेगा, यूंही हार कर के, उठ जिन्दगी को, अब आवाज तो दे।। जो कुचले गए है, नियती के हाथों, वो गुल फिर खिलेंगे, तू साथ तो दे।। और किसने कहां है कि, भरता नहीं जख्म, तू मोहब्बत भरा एक, एहसास तो दे। तू लगता है मुझको कि, खुद से खफा है, खता तेरी नहीं थी , दिल को विश्वास तो दे। वो बीतेगी जो थी, स्याह रात लम्बी, उसे रोशनी की, एक सौगात तो दे।। जो तेरे लिए था, वो तेरा ही होगा, उठ तो जरा तू, दो कदम साथ तो दे।

तेरे दिवाने हैं बेशुमार

काँटों के बीच खिलते हुए, ए हसीं गुलाब, तुझको पता क्या तेरे, दिवाने हैं बेशुमार. हजारों को तेरे हुस्न ने, दिवाना बना दिया, लाखों को तेरे इश्क ने, परवाना बना दिया. दिल ये भी तेरे प्...

पिया मिलन

पिया मिलन तू अमरलता के सम होगी, तू बात बात मुसकाएगी, जब साजन होंगे साथ सखी, तू फूलों सी खिल जायेगी। वो भी होगा एक रंग नया, जो तुझको जवां कर देगा और, जो तेरा रहेगा जीवन भर, वो प्रेम ...

विकास और प्रकृति

कितने राजाओं के वैभव, कितने रंकों की झौपड़ियां धूल हुईं, कितने विकास की फुलझिड़यां, देख शमशान का मूल हुईं। क्यों-कर खेल रहा सृष्टि से, मानव का अधिकार नहीं है, सबसे अद्भुत रचना ब्रम्हा की, लेकिन तू भगवान नहीं हैं। यदा यदा हि धर्मस्य में, श्रीकृष्ण यही बतलाते हैं, जो बाधक बनते सृष्टि कर्म में, तो खुद वो उसे मिटाते हैं। हर तरफ क्रंदन मानव का, देख मेरा मन बहुत ही रोता, कैसा विकास किया हमने, ऐसा कहर है हमपर टूटा। जरा सी पलकों के हिलने से, देख तेरा क्या हाल हुआ है। सुन ध्वनि ये, बिचलित है पर, क्रोधित नहीं महाकाल हुआ है। मानवता का भविष्य सुरक्षित, प्रकृति से कर, बैर नही हैं, कर विकास प्रकृति के संग, वरना तेरी खैर नहीं हैं। --नेपाल भूकंप की पृष्टभूमि पर लिखी गई--

जिंदगी ऐसी मेरी जाने, गुजरती क्यों है?

रंज जिंदगी ऐसी मेरी जाने,  गुजरती क्यों है, तू अभी तक मेरी साँसों में उतरती क्यों है। अब भी है रंज मेरे दिल को,  तेरे खोने का, मेरे हालात पर ये दुनियां यू हंसती क्यों है। अब भी छा जाती है तू, यादों के तूफां की तरह, तुझको जाना है तो जा, जाके पलटती क्यों है। खत सभी तेरे जला डाले थे, उसी पल, लेकिन तेरी यादों की शमा, दिल में मेरे, जलती क्यों है। क्या हुआ है इस शहर को, ए मालिक मेरे, शाम सुऩसान सी, सहमी सी गुजरती क्यों है। सर ये अब भी, मैं झुकाता हूं तेरे दर पर आकर, अब मेरी रात तन्हा-तन्हा सी गुजरती क्यूं है।