मिली-मिली-सी मिली नहीं हो 296
मिली-मिली-सी मिली नहीं हो, जुदा-जुदा-सी जुदा नहीं तुम, हो छा रही तुम गगन धरा पर ख़ुदा-ख़ुदा-सी, ख़ुदा नहीं तुम। ये बात समझा नहीं जमाना, तुम्हारा मिलना कमाल-सा है, खुदा ने जैसे मरु धरा पर, रचा नया एक जमाल-सा है खिला दिया है ये बाग दिल का, घटा-घटा-सी, घटा नहीं तुम हो छा रही तुम गगन धरा पर, ख़ुदा-ख़ुदा-सी, ख़ुदा नहीं तुम। किसी सफर में किसी डगर में, कोई भी रस्ता, जुदा कहाँ है, तुम्हीं से चलकर, तुम्हीं पर आना, मेरा तुम्हीं पर थमा जहान है। तुम्हीं में मिलना है लक्ष्य अंतिम, धरा-धरा-सी धरा नहीं तुम। हो छा रही तुम गगन धरा पर, ख़ुदा-ख़ुदा-सी, ख़ुदा नहीं तुम। है चाह ऐसी लगी तुम्हारी, दीवाना ये दिल बहक रहा है अथाह तुमसे ले प्रेम मन में, ये मन का पंक्षी चहक रहा है मुझे पतंगा बना दिया पर, शमा-शमा-सी, शमा नहीं तुम। हो छा रही तुम गगन धरा पर, ख़ुदा-ख़ुदा-सी, ख़ुदा नहीं तुम। ये मेघ उड़ते महल हैं जैसे, तेरी कहानी छुपा रहे हैं, नयन तुम्हारे ये बनके बिजली, दीवानों को बस मिटा रहे हैं उड़ा दी सारी है नींद जग की बला-बला-सी, बला नहीं तुम। हो छा रही तुम गगन धरा पर, ख़ुदा-ख़ुदा-सी, ख़ुदा नहीं त...