ये चाँद लंबी आहें भर रहा है क्यों (295)
ये चाँद लंबी आहें भर रहा है क्यों? देख कर तुम्हें ये जल रहा है क्यों? मिल रहे हज़ारों लोग जिंदगी की राह में, ये दिल मेरा तुम्हीं पर अड़ रहा है क्यों?.... देखिए अजीब है, अजीब है, अजीब है, अजनबी से तुम तुम्हीं से बंध गया नसीब है, खिल रहे हैं नव कंवल, मन के सूखे ताल में, छप रहे हैं शब्द नवल मन की इस किताब में, हो रही हैं बारिशें, ये मन भटक रहा है क्यों? ये दिल मेरा तुम्हीं पर अड़ रहा है क्यों?.... बन रही है बात फिर बातों से कहानियाँ, ठन रही है रार और लड़ रही जवानियाँ। प्रेम में लिया जो थाम हाथ कैसे छोड़ दें, बात जो कही कभी वो बात कैसे मोड़ दें। प्रेम ही खुदा कहो तो, जग उलझ रहा है क्यों? ये दिल मेरा तुम्हीं पर अड़ रहा है क्यों?.... चाँदनी है रात बात चाँद की ही चल रही, उमंग दिल में ज्वार-सी, चढ़ रही उतर रही, बह रही हैं रश्मियाँ सिंधु इस विशाल में बहक रहा है मन मेरा, तुमको पाकर साथ में, साथ देख तुमको मेरे जग ये जल रहा है क्यों? ये दिल मेरा तुम्हीं पर अड़ रहा है क्यों?....