भाग 1 हे राम! तू मर्यादा का, उत्कृष्ठ शिखर है ये माना, पर सीता पर अन्याय के, दोष का भागी तू भी है। चंद लोगो के कहने से, क्या असत्य, सत्य हो जाएगा, कलयुग में झूठे न्यायाधीश, इसका सहभागी तू भी है। झूठी बात कहै कोई, उस पर ही न्याय विधान बना, कैसे न हो, रोती सीता के, आंसू का अपराधी तू भी है। लोकापवाद से बस बचने को, त्याग सत्य को कैसे दिया, अब तक जो जारी नारी पर, अन्याय, सहभागी तू भी है माना कि एक अवतार सही, तुझको पूजे संसार सही, नारी किस्मत में दर्द लिखा, इसका लेखाधिकारी तू भी है। गर आज कोई इस कलयुग में, नारी को कोई अधिकार न दे, कुछ किया नही लेकिन थोड़ा, इसका तो भागी तू भी है। जब चौदह वर्ष की बात हुई, सब त्याग सिया भी साथ हुई, पर अब भी नारी अविश्वासी है, है पुरुष अपराधी, कुछ तू भी है। भाग 2 जब अन्याय लिखा तो मन मे एक विचार था कि राम भी दुखी थे बिना सीता के, तभी सोचा कि उसपर भी कुछ लिखने का तुच्छ प्रयास करूंगा, लेकिन जब लिखने लगा तो राम के दुखी होने का कोई कारण ही नज़र नही आया, दुख कैसा दुख और क्यों दुख? जब सच सामने था तो किन्ही लोगो की बातों में आकर झूठा न्याय ...