निर्मल गंगा एक ऐसा स्वप्न है जिसके लिए भागीरथ जैसा तप जरूरी है और आज कोई कितना भी इनकार करे लेकिन सब "गंगा मईया" सिर्फ राजनितिक स्वार्थ के लिए ही बोलते हैं, मेरा यह कथन किसी पार्टी या किसी सरकार के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। मैली नदियां स्वार्थ सिद्धि की ऐसी कामधेनू बन गई है कि जिसे कभी कोई स्वच्छ नहीं करना चाहेगा क्योंकि कोई सोने का अंडा देने वाले मुर्गी की बिरयानी नही बनाई जाती। सत्य मानिये तो आज तक नदियों की सफाई के नाम पर जितना अपार धन खर्च क्या गया है उसमे संपूर्ण गंगा को 2-4 बार दुबारा खुदवाया जा सकता था। कोई ये कहे कि सिर्फ 2 वर्ष में गंगा-यमुना या कोई नदी साफ होगी तो वर्तमान में यह असंभव है , अभी तो रिपोर्ट आने में ही सालों लगते हैं। उसके लिए इच्छा शक्ति चाहिए, वोट का मोह त्यागना होगा, कुर्सी का मोह छोड़ कर निर्णय लेने होंगे। जो हिम्मत न पिछली सरकारों में थी न इस सरकार में दिखती है। जैसे ही किसी भी नदी को साफ की बात आती है सब संस्थाऐं नदियों की गंदगी के मुद्दे को धार्मिक रंग देने लगती है ताकि लोग इसको लेकर उदासीन हो जाए। इसके लिए सब का पहला वाक्य है कि नदियों मे...